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डूबता बीठला चिंता का सबब : जब विकास की धार में इतिहास दम तोड़ता है


चंदेरी की पहाड़ियों और शांत वादियों के बीच बसा बीठला गांव आज किसी साधारण भू-भाग का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवित इतिहास का प्रतीक है, जो धीरे-धीरे जल की गोद में समाने को विवश दिखाई देता है। आज पढ़िए, डॉ.जयेन्द्र जैन’निप्पू चन्देरी’ का यह आलेख…! राजीव सिंघई की प्रस्तुति


चंदेरी की पहाड़ियों और शांत वादियों के बीच बसा बीठला गांव आज किसी साधारण भू-भाग का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवित इतिहास का प्रतीक है, जो धीरे-धीरे जल की गोद में समाने को विवश दिखाई देता है। उर्वशी (ओर) नदी पर निर्मित हो रही लोअर ओर परियोजना, जहाँ एक ओर विकास की नई इबारत लिखने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी सांस्कृतिक, धार्मिक और पुरातात्विक धरोहर को अपने साथ बहा ले जाने का संकट भी खड़ा कर रही है।

अशोकनगर जिले की चंदेरी तहसील के अंतर्गत स्थित बीठला केवल एक गांव नहीं रहा—यह एक प्राचीन आस्था और स्थापत्य का केंद्र रहा है। यहाँ स्थित प्राचीन जिनालय आज भी अपने मूल स्वरूप में खड़ा है, मानो समय के थपेड़ों को चुनौती देता हुआ। उसके आसपास बिखरे जिनालयों के खंडहर और जिन शासन से संबंधित यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि यह स्थल कभी एक समृद्ध दिगंबर जैन धार्मिक केंद्र रहा होगा।

स्थापत्य शैली उस कालखंड की सजीव झलक

यदि इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से इस क्षेत्र का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि बीठला और इसका आसपास का क्षेत्र मध्यकालीन भारत में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत विकसित रहा होगा। यहाँ की मूर्तियों की शिल्पकला, पत्थरों की बनावट और स्थापत्य शैली उस कालखंड की सजीव झलक प्रस्तुत करती हैं, जब धर्म और कला एक-दूसरे के पूरक थे। चंदेरी स्वयं प्राचीन काल से ही व्यापार, संस्कृति और धर्म का प्रमुख केंद्र रहा है, और बीठला उसी गौरवशाली परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यह एक विशिष्ट शैलेंद्र (पर्वतीय) वन तीर्थ

यह सम्पूर्ण क्षेत्र दिगंबर जैन परंपरा में एक अतिशय क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित रहा है। “अतिशय” केवल एक धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि उस गहरी आस्था और आध्यात्मिक अनुभवों का प्रतीक है, जो इस भूमि से जुड़े रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों का महत्व केवल एक धर्म तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा होते हैं। बीठला के समीप स्थित भियादांत जी का प्राचीन तीर्थ इस संदर्भ में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यह एक विशिष्ट शैलेंद्र (पर्वतीय) वन तीर्थ है, जहाँ प्राकृतिक गुफाएँ, साधना स्थल और प्राचीन प्रतिमाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

भियादांत तीर्थ पूर्णतः डूब क्षेत्र में नहीं

यहाँ विराजमान भगवान आदिनाथ की प्रतिमा की केश-विन्यास शैली अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट मानी जाती है, जो इसे कला और पुरातत्व की दृष्टि से विशेष महत्व प्रदान करती है। यह प्रतिमा केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्टता का एक जीवंत उदाहरण है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भियादांत तीर्थ पूर्णतः डूब क्षेत्र में नहीं है, परंतु डेम निर्माण के कारण आसपास के गांवों के प्रभावित होने से यहाँ तक पहुँच, संसाधनों की उपलब्धता और संरक्षण कार्यों में गंभीर कठिनाइयाँ उत्पन्न हो रही हैं। यही वह बिंदु है, जहाँ विकास और विरासत के बीच संतुलन की आवश्यकता और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है।

क्षेत्र के संरक्षण और विकास हेतु निरंतर प्रयासरत

भियादांत क्षेत्र में चंदेरी की दिगंबर जैन भियादांत समिति स्वयं सीमित संसाधनों में संरक्षण और निर्माण का कार्य कर रही है। यह प्रयास न केवल सराहनीय है, बल्कि यह दर्शाता है कि समाज अपनी धरोहर के प्रति कितना सजग और समर्पित है। भियादांत कमेटी के मंत्री डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’, चन्देरी सम्पूर्ण कमेटी के साथ मिलकर तन, मन और धन से इस क्षेत्र के संरक्षण और विकास हेतु निरंतर प्रयासरत हैं। विपरीत परिस्थितियों, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक सहयोग के अभाव के बावजूद यह सामूहिक प्रयास एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करता है परंतु, यह भी उतना ही सत्य है कि केवल सामाजिक प्रयासों के बल पर इतनी बड़ी धरोहर को सुरक्षित रखना संभव नहीं है।

भियादांत तीर्थ के लिए पहुँच मार्ग का उन्नयन हो

जब तक प्रशासन, पर्यटन विभाग और संबंधित संस्थाएँ इस दिशा में सक्रिय सहयोग नहीं देंगी, तब तक ऐसे प्रयास अधूरे ही रहेंगे। विशेष रूप से वर्तमान परिस्थितियों में, जब डेम निर्माण के कारण क्षेत्रीय संरचना बदल रही है, तब समन्वित और योजनाबद्ध प्रयासों की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।

ऐसी स्थिति में एक व्यावहारिक और सकारात्मक पहल यह हो सकती है कि पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से भियादांत तीर्थ के लिए पहुँच मार्ग का उन्नयन किया जाए।

बीठला का डूबना शायद एक प्रशासनिक निर्णय

यदि सड़क, परिवहन और मूलभूत सुविधाओं को विकसित किया जाए, तो न केवल श्रद्धालुओं को सुविधा मिलेगी, बल्कि यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण धार्मिक-पर्यटन केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा और संरक्षण कार्यों को नई दिशा प्राप्त होगी। आज आवश्यकता केवल चिंता व्यक्त करने की नहीं, बल्कि ठोस निर्णय लेने की है। विकास और विरासत—दोनों विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं, यदि उन्हें संतुलन के साथ देखा जाए।

बीठला का डूबना शायद एक प्रशासनिक निर्णय है,

पर उसका इतिहास डूबना—हमारी सामूहिक विफलता होगी। जब आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह प्रश्न करेंगी कि हमने अपनी धरोहर के लिए क्या किया, तब हमारे पास उत्तर होना चाहिए—कि हमने केवल विकास नहीं चुना, बल्कि अपनी पहचान को भी बचाने का प्रयास किया।

अब समय आ गया है कि हम केवल दर्शक न बने रहें,

बल्कि अपनी विरासत के रक्षक बनकर आगे आएँ।

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