आचार्य श्री विभवसागर जी के आशीर्वाद से जैन समाज में एक अभूतपूर्व, अलौकिक और वैराग्यमयी मंगल प्रसंग बेहद भव्यता के साथ हुआ। आर्यिका रत्न श्री ओमश्री माताजी की महती कृपा, पावन सानिध्य और छत्रछाया में महावीर विहार स्थित श्री चंद्रप्रभु जिनालय में भव्य दीक्षा समारोह पूर्ण भक्तिभाव और अपार जनसमूह की उपस्थिति में किया गया। टीकमगढ़ से पढ़िए, यह खबर…
टीकमगढ़। आचार्य श्री विभवसागर जी के आशीर्वाद से जैन समाज में एक अभूतपूर्व, अलौकिक और वैराग्यमयी मंगल प्रसंग बेहद भव्यता के साथ हुआ। आर्यिका रत्न श्री ओमश्री माताजी की महती कृपा, पावन सानिध्य और छत्रछाया में महावीर विहार स्थित श्री चंद्रप्रभु जिनालय में भव्य दीक्षा समारोह पूर्ण भक्तिभाव और अपार जनसमूह की उपस्थिति में किया गया। आर्यिका श्री ओम श्री माताजी के पावन एवं आदर्श चरित्र से अनुप्राणित होकर मालथौन (दिगौड़ा) निवासी समाज की परम धर्मनिष्ठ श्राविका और पूर्व शिक्षिका मालतीबाई जैन ने संसार की नश्वरता को पहचानते हुए सल्लेखना पूर्वक दीक्षा धारण करने का सर्वाेच्च आत्म-कल्याणकारी निर्णय लिया। आचार्य श्री के आशीर्वाद से उन्हें क्षुल्लिका श्री ‘संलेखना श्री’ माताजी के रूप में नया संयमी जीवन प्राप्त हुआ है। वर्तमान में माताजी की संल्लेखना साधना अत्यंत दृढ़ता के साथ चल रही है।
दीक्षा मात्र एक क्रिया नहीं, आत्मा का परमात्मा से मिलन का मार्ग
अमन जैन सापोन, अनुराग जैन ने बताया कि अलौकिक दीक्षा विधि की मांगलिक क्रियाएं श्री चंद्रप्रभु जिनालय, महावीर विहार में गगनभेदी जयकारों, मंत्रोच्चार और ढोल-नगाड़ों के बीच हुईं। इच्छामी के जयकारों से पंडाल गूंजा। नव-दीक्षित क्षुल्लिका श्री संलेखना श्री माताजी को धर्मप्रेमी बंधुओं और सकल जैन समाज ने सामूहिक रूप से इच्छामी, इच्छामी माताजी कहते हुए वंदन किया और मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।
पुण्य की स्वर्णिम अनुमोदना
उपस्थित जनसमुदाय ने नव-दीक्षित माताजी के इस उत्कृष्ट वैराग्य, कठोर त्याग और उनके महान पुण्य की भूरि-भूरि अनुमोदना की। इस अलौकिक कार्य को समाज ने स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने योग्य बताया। इस संपूर्ण भव्य आयोजन को सफल बनाने में समस्त जैन समाज की विभिन्न कमेटियों, प्रबुद्ध जनों और युवाओं का पूर्ण सहयोग एवं सानिध्य प्राप्त हुआ। समाज के सभी बंधुओं ने तत्परता से अपनी भूमिका निभाते हुए धर्म प्रभावना को बढ़ाया। सकल दिगंबर जैन समाज इस भव्य जीव की उत्कृष्ट साधना और दृढ़ सल्लेखना की बारंबार अनुमोदना करता है। आचार्य श्री विभव सागर जी महाराज एवं आर्यिका श्री ओम श्री माताजी के इस अनंत उपकार के प्रति संपूर्ण समाज नतमस्तक हैं।













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