Tag - देव शास्त्र गुरु

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9वें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत जी का गर्भकल्याणक 10 फरवरी: तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण नवमी को मनाया जाएगा 

जैन धर्म के तीर्थंकरों के कल्याणकों को लेकर दिगंबर जैन मंदिरों में खासतौर पर विशेष आराधना, भक्ति और पूजन, विधान सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं होती हैं।...

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बुजुर्गों का बहुमान, जैन मित्र मंडल का अनुकरणीय कार्य : मुनिश्री विलोकसागरजी के सानिध्य में हुआ सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह 

श्री नसियाजी जिनालय में जैन मित्र मंडल के सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह रखा गया। इसमें मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कहा कि बुजुर्गों ने आपको बोलना...

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स्वप्न में भी यदि आत्महत्या का भाव आए तो प्रायश्चित लेना आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने मरण के प्रकारों का कराया ज्ञान 

आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मरण के प्रकार के विषय में प्रकाश डाला। इच्छा मरण और अनिच्छा मरण के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि इच्छा में लोग...

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देव शास्त्र गुरु शरण में भक्ति से पाप कर्मों की होती है निर्जरा : मुनि श्री पूज्य सागर जी ने कहा- गुरु भक्ति से होती है पुण्य की प्राप्ति 

अंतर्मुखी मुनिश्री 108 श्री पूज्य सागर जी महाराज ने आज अशरण भावना की विवेचना की। मुनिश्री पूज्यसागर जी ने बुधवार को दिगंबर जैन मंदिर परिवहन नगर में कहा कि देव...

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जीवन में अच्छा चाहते हो तो क्रोध मान माया लोभ छोड़ो: मुनिश्री के प्रवचनों का पुण्य अर्जन कर रहे श्रद्धालु

दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में इन दिनों मुनिश्री के प्रवचन जारी है। मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि मंदिरों में शुभ भावों की...

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देव शास्त्र गुरु के प्रति आस्था कुएं के जल के समान: आस्था अंतर्मन से प्रकट होनी चाहिए-मुनिश्री शुध्द सागर जी 

सुमतिधाम में होने जा रहे पट्टाचार्य महोत्सव में शामिल होने के लिए इंदौर पधारे मुनिश्री शुद्धसागर जी महाराज ने समर्थ सिटी में प्रवचन दिए। वे श्री पारसनाथ जिनालय...

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संयम दीक्षा धारण करने से सच्चा सुख मिलता है-मुनि हितेंद्र सागरजीः आचार्य वर्धमान सागरजी धर्म प्रभावना कर रहे हैं।

साधुओं की जन्म एवं कर्म भूमि धर्मनगरी मुंगाणा में आचार्य वर्धमान सागरजी ससंघ विराजित है। श्रावक-श्राविकाओं के संस्कार शिविर का आयोजन चल रहा है। जिसमें हितेंद्र...

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स्त्रियों में हमेशा प्रमाद विद्यमान रहता है-आचार्यश्री वर्धमान सागरजीः श्री महायशमति ने श्रावक का अर्थ प्रतिपादित किया

प्रमादमय स्त्रियों को प्रमादमय मूर्तियों की उपमा दी गई है, अर्थात स्त्रियों में हमेशा प्रमाद विद्यमान रहता है, जिस प्रकार मिट्टी की मूर्ति में मिट्टी की बहुलता...

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