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भगवान अनन्तनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक दिवस पर विशेष : वर्द्धमानपुर (बदनावर) से प्राप्त प्राचीन जैन प्रतिमाओं का महत्व


चैत्र कृष्ण चतुर्दशी 18 मार्च को जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ स्वामी का ज्ञान कल्याणक एवं मोक्ष कल्याणक दिवस तथा 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। बदनावर/वर्द्धमानपुर से पढ़िए, यह खबर…


बदनावर/वर्द्धमानपुर। चैत्र कृष्ण चतुर्दशी 18 मार्च को जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ स्वामी का ज्ञान कल्याणक एवं मोक्ष कल्याणक दिवस तथा 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। इसके अगले दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (19 मार्च) को 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ स्वामी का गर्भ कल्याणक दिवस भी मनाया जाएगा। इन तीनों तीर्थंकरों की प्राचीन प्रतिमाएं ऐतिहासिक नगरी वर्द्धमानपुर (वर्तमान बदनावर) के भू-गर्भ से प्राप्त हुई हैं, जो इस क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक और पुरातात्विक महत्व को दर्शाती हैं।

 

यह जानकारी देते हुए वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि देश में अनेक ऐसे तीर्थ क्षेत्र हैं। जहां भू-गर्भ से केवल एक प्रतिमा प्राप्त होने पर ही वह स्थान अतिशय क्षेत्र के रूप में विख्यात हो जाता है। किंतु बदनावर-वर्द्धमानपुर एक ऐसा अद्भुत क्षेत्र है जहां से केवल एक-दो नहीं, बल्कि चौबीसों तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भूगर्भ से प्राप्त हुई हैं। यह घटना अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण और अतिशयकारी मानी जाती है।

उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में जैन धर्म का समृद्ध केंद्र रहा होगा। दुर्भाग्यवश स्थानीय जनमानस और जनप्रतिनिधियों का अपेक्षित ध्यान इस ऐतिहासिक धरोहर की ओर नहीं गया, जिसके कारण इतना महत्वपूर्ण पुरातात्विक क्षेत्र अब तक व्यापक पहचान प्राप्त नहीं कर सका। हालांकि अब क्षेत्र के बुद्धिजीवी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और समाजजन इस ऐतिहासिक महत्व को सामने लाने के लिए सक्रिय हो रहे हैं, जो एक सकारात्मक संकेत है।

 

पाटोदी के अनुसार लगभग 75 वर्ष पूर्व वर्द्धमानपुर क्षेत्र के भूगर्भ से भगवान अनन्तनाथ स्वामी, अरहनाथ स्वामी और मल्लिनाथ स्वामी की प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। इन प्रतिमाओं के संबंध में अभी तक आम जनमानस को पर्याप्त जानकारी नहीं थी। उनके कल्याणक दिवस के अवसर पर वर्द्धमानपुर शोध संस्थान द्वारा यह ऐतिहासिक जानकारी सार्वजनिक की जा रही है।

 

भगवान अनन्तनाथ स्वामी की प्रतिमा के पादपीठ पर तीन पंक्तियों का एक महत्वपूर्ण अभिलेख अंकित है, जिससे ज्ञात होता है कि यह प्रतिमा विक्रम संवत 1506 (ईस्वी सन् 1449) में प्राचीन वर्द्धमानपुर के किसी जिनालय में प्रतिष्ठित की गई थी। यह प्रतिमा हरे बेसाल्ट पत्थर से निर्मित है। वहीं भगवान मल्लिनाथ स्वामी की प्रतिमा काले बलुआ पत्थर से बनी हुई है। इस प्रतिमा पर कोई अभिलेख नहीं है, किंतु शैली और शिल्प के आधार पर इसे अनन्तनाथ स्वामी की प्रतिमा से भी अधिक प्राचीन माना जाता है।

 

इतिहासकारों के अनुसार यदि इस क्षेत्र की पुरातात्विक और धार्मिक धरोहरों पर व्यवस्थित शोध और संरक्षण का कार्य किया जाए, तो वर्द्धमानपुर (बदनावर) देश के महत्वपूर्ण जैन तीर्थ और ऐतिहासिक स्थलों में अपना विशिष्ट स्थान प्राप्त कर सकता है।

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