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श्रुतपंचमी महापर्व पर हुआ श्रुत स्कंध विधान : आचार्य धरसेन का किया गया स्मरण, पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, समर्थ सिटी में श्रद्धा, उत्साह से हुआ आयोजन


जैन आगम ग्रंथों को लिपिबद्ध किए जाने की ऐतिहासिक घटना की स्मृति में श्रुतपंचमी महापर्व स्थानीय श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, समर्थ सिटी में श्रद्धा, उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। इंदौर से ओम पाटोदी की रिपोर्ट…


इंदौर। जैन आगम ग्रंथों को लिपिबद्ध किए जाने की ऐतिहासिक घटना की स्मृति में श्रुतपंचमी महापर्व स्थानीय श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, समर्थ सिटी में श्रद्धा, उत्साह और उमंग के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रुत स्कंध विधान का भव्य आयोजन पंडित शुभम् जैन के सानिध्य में हुआ। जिसमें आचार्य धरसेन स्वामी का विशेष रूप से स्मरण किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री जिनेन्द्र भगवान के अभिषेक एवं विश्व मंगल शांतिधारा से हुआ। जिनवाणी की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि जिनेन्द्र भगवान के प्रथम अभिषेक का सौभाग्य शुभम कुमार, उत्तमचंद जैन पंडित, बड़ामलहरा को प्राप्त हुआ। चतुर्थ कोण अभिषेक का लाभ अजित जैन नीम वाला परिवार, अर्जित जैन, शरद कुमार जैन, अंकित नाहर एवं संजय जैन अहिंसा परिवार ने लिया।

इनको मिला सौभाग्य

शांतिधारा करने का पुण्य अखिलेश-प्राची जैन एवं आदिकुमार विन्ध परिवार को मिला। मंडल पर मंगल कलश स्थापना साधना जैन, कीर्ति पाटोदी, तनु जैन, रेशु जैन, आरजु जैन ने की जबकि, दीपक स्थापना का लाभ डॉ. सतीश जैन को प्राप्त हुआ। कार्यक्रम के समापन पर मंदिर प्रांगण में समाज प्रमुख शैलेष चन्देरिया एवं समाजजनों ने पंडित शुभम् जैन का सम्मान किया। इस अवसर पर समर्थ सिटी सहित आसपास की कॉलोनियों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

 श्रुतपंचमी का 2000 साल पुराना इतिहास

ज्ञातव्य है कि श्रुतपंचमी के दिन आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व आगम ग्रंथों को लिपिबद्ध करने का कार्य पूर्णता को प्राप्त हुआ था। महान दिगम्बर जैनाचार्य श्री धरसेन स्वामी की दिव्य प्रज्ञा से मुनि श्री भूतबलि स्वामी एवं पुष्पदंत स्वामी द्वारा ताड़पत्र पर लिपिबद्ध करने का अद्भुत, अद्वितीय कार्य गिरनार पर्वत की चंद्रगुफा में सम्पन्न हुआ था।

गिरनार जी में हैं धरसेन जी के चरण चिन्ह

आज भी गिरनार पर्वत की इस गुफा में आचार्य श्री धरसेन स्वामी के हजारों वर्ष प्राचीन चरण चिन्ह स्थापित हैं। इससे पूर्व भगवान महावीर की वाणी को सुनकर ही स्मरण किया जाता था। इसीलिए उसका नाम ‘श्रुत’ था। श्रुतपंचमी के दिन ही पहली बार इसे लिपिबद्ध परंपरा में बदला गया, जिससे जिनवाणी आज तक सुरक्षित है।

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