श्रुत पंचमी के पावन अवसर पर अंबाह की श्रीमती नीति जैन ने जिनवाणी, ज्ञान और जैन संस्कृति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मकल्याण, स्वाध्याय और संस्कारों के संरक्षण का प्रेरक अवसर है।
अंबाह। श्रुत पंचमी जैन धर्म का गौरवशाली और पवित्र पर्व है, जो ज्ञान की अगाध महिमा, शास्त्रों के संवर्धन तथा समृद्ध संस्कृति के संरक्षण की प्रेरणा देता है। श्रुत पंचमी के अवसर पर अपने संदेश में श्रीमती नीति जैन ने कहा कि यह पर्व हमें जिनवाणी के प्रति श्रद्धा, अध्ययन और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाता है।
षट्खण्डागम रचना पूर्ण होने का स्मृति दिवस
उन्होंने बताया कि इसी दिन आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबलि महाराज ने जैन धर्म के प्रथम लिखित ग्रंथ ‘षट्खण्डागम’ की रचना पूर्ण की थी। इस ऐतिहासिक कार्य के माध्यम से भगवान महावीर की दिव्य देशना को लिपिबद्ध स्वरूप प्राप्त हुआ, जो आज भी अनगिनत श्रद्धालुओं के लिए ज्ञान का स्रोत बनी हुई है।
जिनवाणी है मोक्ष मार्ग का प्रकाश
श्रीमती नीति जैन ने कहा कि जिनवाणी केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि वह दिव्य प्रकाश है जो हमें सत्य, अहिंसा, संयम और मोक्ष के मार्ग पर चलना सिखाती है। जिनवाणी हमें क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों का त्याग कर प्रेम, करुणा, क्षमा और सदाचार को अपनाने की प्रेरणा देती है।
ज्ञान जीवन का दीपक है
उन्होंने कहा कि “ज्ञान ही वह दीपक है, जो जीवन के अंधकार को दूर कर मोक्ष के मार्ग को प्रकाशित करता है।” श्रुत पंचमी केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि अपने भीतर ज्ञान का दीप प्रज्वलित करने का पर्व है।
इन संकल्पों को जीवन में उतारने का आह्वान
श्रुत पंचमी के अवसर पर उन्होंने सभी से आगमों का गहन अध्ययन एवं मनन करने, अर्जित ज्ञान को जीवन और आचरण में उतारने, अहिंसा, सत्य और अनेकांतवाद के मार्ग पर दृढ़ता से चलने तथा अपने संस्कारों को सुरक्षित रखते हुए अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान किया।
आत्मकल्याण का संदेश
उन्होंने मंगल भावना व्यक्त करते हुए कहा कि ज्ञान की यह पावन धारा सभी के जीवन को आलोकित करे और प्रत्येक व्यक्ति आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़े। यही श्रुत पंचमी महापर्व का वास्तविक संदेश और उद्देश्य है।













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