परतापुर निवासी युवा शिक्षक संजय दोसी पुत्र नथमल दोसी अति शीघ्र जैनेश्वेरी दीक्षा ग्रहण करेंगे । संजय दोसी ने पिछले पच्चीस वर्षो से अधिक समय तक शिक्षक के रूप में सेवाएं दी। परतापुर से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह खबर…
परतापुर । उडा जा रहा है पंछी हरि भरी डाल से, रोको तो रोको कोई मुनि को विहार से। यह गीत उस गृहस्थ के लिए, जो बनने जा रहे मुनि उनके लिए है। जो वागड को धन्य करने जा रहे है उनके लिए। परतापुर ही नहीं यह वागड मेवाड और गुजरात के जैन समाज के लिए हर्ष का विषय है कि परतापुर निवासी युवा शिक्षक संजय दोसी पुत्र नथमल दोसी अति शीघ्र जैनेश्वेरी दीक्षा ग्रहण करेंगे । संजय दोसी ने पिछले पच्चीस वर्षो से अधिक समय तक शिक्षक के रूप में सेवाएं दी तथा शिक्षा के साथ संतों का सानिध्य पाकर धर्म को ऐसा अंगीकार करते गए। वैसे तो हर संत की सेवा तत्पर रहते है परंतु परतापुर में ही वर्षो पूर्व दीक्षा लेने वाले अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी गुरुदेव के दर्शन के बाद इतने उनसे प्रभावित हुए कि आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज से पिछले सात आठ वर्षो से दीक्षा लेने की भावना प्रकट कर रहे थे। आचार्य श्री ने भी परम भक्त की भावना पर अपनी कृपा बरसाई की दिल्ली से लगातार विहार कर अगले सप्ताह तक वागड में प्रवेश करेंगे। वैसे तो गुरु से आपका जुडाव 1988 से ही है और गुरू भक्त संजय दोसी को जैनेश्वरी दीक्षा देकर उनकी मानव पर्याय को धन्य करेंगे। उन्होंने सिद्धचक्र महामंडल विधान करने, भगवान की प्रतिमा स्थापित करने और आगामी दीक्षा पूर्व ‘भगवान के माता-पिता’ बनने का दुर्लभ सौभाग्य पाया। वर्तमान में उनके घर में मां निर्मला देवी ,पत्नी मैना देवी और पुत्र चिंतन जैन है तथा पुत्री मुक्ति जैन का विवाह हो गया है।
समय से पूर्व ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति
दीक्षा का भाव बना चुके शिक्षक संजय दोसी ने एक वर्ष पूर्व अपने शिक्षक पद से समय से पूर्व ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ लेकर गुरु सेवा में लग गए तथा आचार्य श्री कनकनंदी महाराज ससंघ का वर्ष 2025 का गौरी आश्रम भिलुडा में भव्य चातर्मास करने का पुण्यार्जन प्राप्त किया और गृहस्थ जीवन में प्रवेश के बाद भी इस युगल ने संसार की चकाचौंध के बजाय संयम को प्राथमिकता दी।
साधना: दोनों ने साथ मिलकर प्रथम व द्वितीय प्रतिमा के व्रत अंगीकार किए। कठिन तपस्याएँ जैसे: 10 लक्षण, पंचमेरु,सोलह कारण के 16उपवास मोन पूर्वक भक्तामर, ज्ञानपच्चीसी, तत्वार्थ सूत्र, सम्मेद शिखर वंदना और आचार्य 36 के उपवास आदि नियम एक साथ पूर्ण किए। यह आधुनिक युग में गृहस्थ जीवन के बीच ‘तपोमय जीवन’ का दुर्लभ उदाहरण है।
साधु सेवा संस्थान: आपके संरक्षण में मात्र 4 लोगों से शुरू हुए इस संस्थान ने आज 300 साधु भक्तों की विशाल फ़ौज खड़ी कर दी है। आपके ही कुशल नेतृत्व में साधु सेवा संस्थान द्वारा 3 बार श्री सम्मेद शिखर जी की निशुल्क यात्रा सफलतापूर्वक आयोजित की गई।
परोपकार: परतापुर में गौशाला निर्माण में पूर्ण सहयोग और राजकीय चिकित्सालय में ‘निशुल्क भोजनालय’ का संचालन।
संस्थागत निष्ठा: तरुण क्रांति मंच और महावीर इंटरनेशनल के माध्यम से निरंतर सक्रियता।
एक परिचय
जन्म: 16 फरवरी 1972 (परतापुर)
माता-पिता: निर्मला देवी एवं नथमल जी दोसी
परिवार: पुत्र चिंतन एवं पुत्री मुक्ति (जो इस वैराग्य पथ के साक्षी और संबल हैं)।
दांपत्य जीवन: मोक्ष मार्ग में सहगामी मैना देवी













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