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मैं आनंद स्वरूप हूं, ऐसा अनुभव करना होगा : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी ने दिए वेबिनार में स्वयं को पहचाने के सूत्र 


आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट…


डडूका। आचार्य कनक नंदीजी ने शिवगौरी आश्रम भिलुड़ा राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कहा कि स्वयं को जानना विश्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं समस्त दुखों से संसार की प्रत्येक वस्तु से भिन्न हूं। मैं आनंद स्वरूप हूं, ऐसा अनुभव करना पड़ेगा। चेतना ही परम आध्यात्मिक मैं हूं। उन्होंने कहा कि संकल्प विकल्प से आत्म शक्ति कुंठित हो जाती है। जिसका मन शांत हो गया है, उसके विकार शांत हो गए हैं। ऐसा योगी आत्म सुख प्राप्त करता है। ज्ञानानंद सच्चिदानंद आत्मा से जुड़ने वाले योगी प्राप्त करते हैं। आर्त ध्यान रौद्र ध्यान करते हुए प्रसन्नता आनंद शांति कभी प्राप्त नहीं हो सकती। कभी दुर्गुणों से युक्त होने पर प्रसन्नता खुशी नहीं प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि शारीरिक मलमूत्र के वेग को नहीं रोकना चाहिए परंतु, मानसिक रोग ईर्षा, द्वैष, घृणा, अहंकार आदि को रोकना चाहिए। जिस प्रकार बल्ब के ऊपर धूल मिट्टी लगी हुई है तो प्रकाश फैलता नहीं है। इसी प्रकार इन मानसिक रोगों से आत्मा का प्रकाश जागृत नहीं होता है। बॉडी माइंड सॉल का अंतर संबंध है, तीनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। ध्यान मन की पवित्रता योग मोक्ष लक्ष्मी को वश करने के लिए श्रेष्ठ उपाय है। मन से अधिक शक्तिशाली आत्मा है। जब तक मन शांत नहीं है तब तक बाह्य तप करना शरीर को दंडित करना है।

मन शुद्धि से अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं

अधिकतर संसारी लोग शारीरिक सुख के लिए धर्म करते हैं। जिस प्रकार तुष अर्थात छिलके कूटने से केवल श्रम होता है परंतु चावल नहीं निकलते हैं वैसे ही आत्मज्ञान बिना अनंत भव में साधु बनने पर भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते। मन की शुद्धि ही एक मोक्ष मार्ग रुपी मार्ग में मार्ग प्रकाशक दीपिका है। इसको नहीं पाने से अनेक मोक्ष मार्गाे मोक्ष मार्ग से च्युत हो जाते हैं। मन शुद्धि से अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं। जिनके पास गुण नहीं होते हैं परंतु मन शांत होने पर गुण प्रकट हो जाते हैं। मन शुद्ध से स्वयं ज्ञान प्रकट होता है। आनंद उत्पन्न होता है। मन की अशुद्धि से जो गुण होते हैं वह भी दुर्गुण बन जाते हैं। कब ये पापी मन पावन होगा। कब राग,द्वैष, मोह त्यागेगा। इस कविता द्वारा मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने मंगलाचरण किया। ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।

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