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जिसके जीवन में गुरु नहीं, उसका जीवन शुरू नहीं: सिद्धचक्र विधान के पांचवे दिन 128 अर्घ्य होंगे समर्पित


बड़े जैन मंदिर में मुनिराजश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में आठ दिवसीय सिद्धों की आराधना का अनुष्ठान चल रहा है। रविवार को सिद्धचक्र महामंडल विधान के चौथे दिन 64 ऋद्धिधारी मुनिराजों की आराधना करते हुए 64 अर्घ्य समर्पित किए गए। इस अवसर पर मुनिश्री के प्रवचन हुए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। मनुष्य के जीवन में गुरु का अत्यधिक महत्व है। जिसके जीवन में गुरु नहीं, उसका जीवन शुरू नहीं। गुरु अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक होते हैं। वे हमें सही और गलत का भेद बताते हैं, जीवन के सही मार्ग पर चलना सिखाते हैं और हमें सफलता की ओर ले जाते हैं। गुरु-शिष्य परंपरा हमारे देश में सदियों से चली आ रही है। गुरु शिष्य परम्परा के अंतर्गत गुरु अपने शिष्य को शिक्षा देता है। बाद में वही शिष्य गुरु के रूप में दूसरों को शिक्षा देता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। बगैर गुरु के आप आध्यात्म की प्राप्ति नहीं कर सकते । गुरु की शिक्षाओं के द्वारा, उपदेशों के द्वारा, उनकी प्रेरणाओं के द्वारा ही हम धर्म के स्वरूप को समझ सकते हैं। भगवान कौन हैं, भगवान कैसे है, भगवान की पूजा, भक्ति, उपासना कैसे करना चाहिए ये सब हमें गुरु ही सिखाते हैं। जो कार्य भगवान नहीं कर सकते बे कार्य गुरु के द्वारा हो सकते हैं।

उक्त उद्गार मुनिराजश्री विलोकसागर महाराज ने श्री सिद्धचक्र विधान के चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुनिराज विलोकसागर महाराज ने मानव जीवन में गुरु के महत्व को बताते हुए कहा कि गुरु के पास समर्पण, श्रद्धा और निष्काम भाव से बिना किसी अहंकार या अपेक्षा के जाना चाहिए। गुरु के पास चुनौती भरे भाव से नहीं जाना चाहिए। अध्यात्म को समझने के लिए, ज्ञान प्राप्ति के लिए जिज्ञासु भी होना चाहिए। कभी भी खुद को गुरु से श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए ।गुरु हमेशा मनुष्य के मार्गदर्शक रहे हैं। गुरु मनुष्य के जीवन से अंधकारमय अज्ञान को निकालने का कार्य करते हैं। अज्ञानता दूर करके ज्ञान का प्रकाश देकर उसे मोक्ष के द्वार तक पहुंचाने का काम गुरू ही करते हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु को भगवान से भी ऊपर स्थान दिया गया है।

सोमवार को 128 अर्घ्य होंगे समर्पित

विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी संजय भैयाजी ने बताया कि बड़े जैन मंदिर में मुनिराजश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में आठ दिवसीय सिद्धों की आराधना का अनुष्ठान चल रहा है। रविवार को सिद्धचक्र महामंडल विधान के चौथे दिन 64 ऋद्धिधारी मुनिराजों की आराधना करते हुए 64 अर्घ्य समर्पित किए गए। यह ऋद्धियां समस्त दुखों को, रोगों को नाश करने वाली एवं सुख समृद्धि देने वाली होती हैं। सोमवार को सिद्धों की भक्ति करते हुए 128 अर्घ्य समर्पित किए जायेगें ।

वर्षायोग के लिए श्रीफल किया समर्पित

वर्षायोग में काफी कम समय बचा है लेकिन, अभी तक मुरैना के बड़े मंदिर जी में विराजमान मुनिराजों ने नगर में वर्षायोग करने की स्वीकृति प्रदान नहीं की है। हालांकि स्थानीय जैन समाज ने युगल मुनिराजों के वर्षायोग की तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं, लेकिन स्वीकृति न मिलने के कारण वर्षायोग पर संशय बना हुआ है। स्थानीय सकल जैन समाज ने श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर कमेटी के साथ मुनिराज विलोकसागरए मुनिश्री विबोधसागर महाराज के श्री चरणों में श्रीफल समर्पित करते हुए नगर में चातुर्मास करने हेतु निवेदन किया। गुरुदेव ने सभी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि वर्षायोग मिले या न मिले, आप सभी लोग एक संकल्प लो कि सदैव दिगंबर मुनियों के आहार विहार और वैयावृति में सलंग्न रहेंगे।

सिद्धचक्र विधान से जन्मजन्मांतर के पापों का क्षय होता है

प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी अजय भैयाजी (झापन तमूरा वाले) ने श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान को जन्मजन्मांतर के पाप नष्ट करने वाला विधान बताते हुए कहा कि इस विधान में सभी विधानों का समायोजन रहता है । जैन दर्शन एवं सिद्धांतों के अनुसार श्रद्धा, भक्ति एवं विधि के अनुसार भक्तामर पाठ से 100 जन्मों, श्री शांतिनाथ विधान से 1000 जन्मों, पंच परमेष्ठि विधान से लाखों वर्षों, सहस्त्रनाम विधान से करोड़ों वर्षों एवं सिद्धचक्र विधान से जन्मों-जन्मों के पापों का क्षय हो जाता है।

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