जैन दर्शन में त्याग की महिमा का गुणगान किया गया है। त्याग की भावना रखने वाला प्राणी सदैव सुख शांति से जीवन यापन करता है। जैन धर्म में त्याग एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो साधकों को आध्यात्मिक विकास और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करती है। यह केवल वस्तुओं का त्याग नहीं है, बल्कि कर्मों और अहंकार का भी त्याग है। यह उद्गार बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोक सागर जी ने धर्मसभा में व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
मुरैना। जैन दर्शन में त्याग की महिमा का गुणगान किया गया है । त्याग की भावना रखने वाला प्राणी सदैव सुख शांति से जीवन यापन करता है । जैन धर्म में त्याग एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो साधकों को आध्यात्मिक विकास और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करती है। यह केवल वस्तुओं का त्याग नहीं है, बल्कि कर्मों और अहंकार का भी त्याग है। यह उद्गार बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि त्याग के माध्यम से, व्यक्ति सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर शांति और आनंद का अनुभव कर सकता है। जैन धर्म में त्याग का अर्थ है सांसारिक इच्छाओं और आसक्तियों का स्वेच्छा से परित्याग करना, जो आध्यात्मिक विकास और मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह केवल वस्तुओं का त्याग नहीं है, बल्कि कर्मों के प्रति आसक्ति और अहंकार का भी त्याग है।
जैन धर्म में त्याग को एक महत्वपूर्ण गुण माना गया है, जो साधकों को सांसारिक बंधनों से मुक्त होने में मदद करता है। मुनिश्री ने बताया कि त्याग का अर्थ है सभी प्रकार के मोहों से उत्पन्न पापकर्मों से पूर्णतः विरक्त हो जाना। ऐसा व्यक्ति पापपूर्ण विचार नहीं रखता, पापपूर्ण वचन नहीं बोलता और अपने शरीर, मन और आत्मा से कोई पापकर्म नहीं करता। वह न केवल सभी प्रकार के पापों से पूर्णतः विरत रहता है, बल्कि दूसरों द्वारा किए जाने वाले पाप का भी समर्थक नहीं बनता। इसलिए एक मनुष्य को मूल दुख अर्थात मोह का त्याग कर देना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि, जो व्यक्ति मोह अर्थात धन, वासना इत्यादि का त्याग कर देता है। वह सदैव सुखी जीवन व्यतीत करता है।
जैन संस्कृत विद्यालय में चल रहा है शांतिनाथ विधान
परम पूज्य युगल मुनिराजश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के ओवन सान्निध्य में जैन संस्कृत महाविद्यालय में सावन माह के शुक्ल पक्ष में सोलह दिवसीय श्री शांतिनाथ विधान 25 जुलाई से 09 अगस्त तक सुचारू रूप से चल रहा है। विधान की समस्त धार्मिक क्रियाएं विधानाचार्य चक्रेश जैन शास्त्री संपन्न करा रहे हैं। उक्त विधान में जैन संस्कृत विद्यालय के सभी छात्र पूर्ण तन्मयता, श्रद्धा एवं भक्ति के साथ प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन करते हुए भगवान शांतिनाथ स्वामी को अर्घ्य समर्पित कर रहे हैं। आज विधान आयोजन को दसवा दिन है, अभी तक रेखा संजय जैन, पंकज अरिहंत जैन मेडिकल, रवींद्र जैन गोसपुर, विशंभर दयाल अनूप जैन, जितेंद्र जैन बंटी, कुसुम चक्रेश शास्त्री विधान के पुण्यार्जक बन चुके हैं। 09 अगस्त को विश्व शांति महायज्ञ के साथ विधान का समापन होगा।
चल रहा है महामंत्र णमोकर लेखन कार्य
नगर में चातुर्मासरत युगल मुनिराज लोगों को धर्म के प्रति जागरूक करने के लिए नित नित अनेकों प्रकार के आयोजन कर रहे है। अभी हाल ही में उन्होंने सभी श्रावकों को महामंत्र णमोकर के लेखन का कार्य करने के प्रति जागरूक किया है। पुण्यार्जक परिवार रेखा संजय जैन के सौजन्य से लगभग 300 पुस्तिकाएं वितरित की गई हैं। सर्वाधिक संख्या में लेखन करने वालों को क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कार प्रदान किए जायेगें। पुण्यार्जक परिवार महावीर प्रसाद, गंगाविशन, अशोक कुमार, कैलाशचंद जैन जौरा की ओर से पुरस्कार वितरित किए जाएंगे।













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