मुनि श्री आदित्यसागर जी धरातल पर प्रत्यक्ष दर्शन देने वाली उन भव्य आत्माओं में से एक हैं, जिनका सान्निध्य पारस मणि के स्पर्श के समान है। इंदौर से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की खबर…
इंदौर। मुनि श्री आदित्यसागर जी धरातल पर प्रत्यक्ष दर्शन देने वाली उन भव्य आत्माओं में से एक हैं, जिनका सान्निध्य पारस मणि के स्पर्श के समान है। आपके 40 वें अवतरण दिवस पर उनके चरणों में नमन। संस्कारधानी जबलपुर के मस्तक पटल पर गौरव का चंदन तो उसी दिन लग चुका था, जब 24 मई 1986 के दिन, पिता राजेश और माँ वीणा की कोख में जन्म हुआ था। वैसे तो इस पुत्र का नाम सन्मति रखा गया था, पर कोई नहीं जानता था कि यही सन्मति एक दिन जिनशासन के यश आकाश को प्रकाशित करने वाला अद्वितीय आदित्य बन कर उदित होगा, एक दिन अपनी साधना और वात्सल्य के बल पर सहस्रों लोगों के जीवन में सौभाग्य बन कर प्रवेश कर जाएगा परंतु, हम ने उनके चमत्कारों पर या लाखों लोगों द्वारा हो रहे उनके जय-जयकारों के सामने अपना मस्तक नहीं टेका, हम ने किसी भय या स्वार्थ से उन्हें अपना गुरु नहीं माना…। हमने तो बहुत गहराई से समझा उस व्यक्ति को जिसने MBA (Gold Medalist) और BBA जैसी शैक्षिक योग्यता, संपन्न एवं समृद्ध परिवार, स्वर्ण-आभूषणों के प्रतिष्ठित व्यापार और सुकुमारिता से भरे भविष्य की कामनाओं को एक पल में किसी तृण के समान छोड़ देने का साहस किया। जिसके पास विलासितापूर्ण जीवन जीने के अनेकों विकल्प मौजूद थे। जिसकी प्रखर दैहिक आभा, अप्रतिम सुंदरता, अद्वितीय बुद्धिलब्धि और पुण्य-शक्ति के आगे सभी सांसारिक सुख किसी चरण चंचरिक की तरह उसके सामने नतमस्तक होने को तैयार बैठे थे…
परंतु, इन सब मोह और सुखों के आगे तो भोगी झुका करते हैं योगी नहीं, सन्मति भैया ने जो पथ चुना7 था वह इन सब से ऊपर था- निर्ग्रंथ पथ और फिर सन्मति भैया ने 8 नवम्बर 2011 को गुरु के प्रति समर्पण के विशुद्ध-सागर में ऐसी डुबकी लगाई कि सागर के अंदर जो गया वह थे सन्मति, पर जो बाहर आये वह थे “आदित्य”…*।जिन्होंने हम जैसे अनेकों को सत्पथ दिखाया, हम जब जब गिरने लगे उनके शब्दों ने हमें वापस उठाया, उन्होंने हमें कला सिखाई कि जीवन कैसे जिया जाता है, उन्होंने हमें बताया व्यक्ति को व्यक्तित्व कैसे बनाया जाता है। उन्हें शब्दों में बयॉं कर पाना संभव नहीं है, हाँ ! ये वही हैं जिनके लिये असंभव भी पूरी तरह असंभव नहीं है।













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