मोरपंख को लेकर दिए गए बयान के बाद जैन समाज में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। समाजजनों ने इसे अहिंसा की परंपरा पर प्रश्नचिह्न बताया और तथ्य आधारित संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। पढ़िए डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’ का आलेख ।
चन्देरी। मोरपंख को लेकर दिए गए एक बयान के बाद देशभर के लाखों जैन श्रावकों में गहरी पीड़ा और असंतोष व्याप्त है। जैन समाज का कहना है कि अहिंसा और जीवदया उसके मूल सिद्धांत हैं, इसलिए किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाकर धार्मिक कार्यों में उपयोग की कल्पना भी जैन दर्शन के विपरीत है।
भारतीय संस्कृति में मोरपंख का महत्व
जैन समाज के अनुसार भारतीय संस्कृति में मोरपंख का विशेष महत्व रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में मोरपंख का उल्लेख पवित्रता, सौंदर्य और प्रकृति के प्रति सम्मान के प्रतीक के रूप में किया जाता है। जैन साधु-संतों की परंपरा में भी मोरपंख से निर्मित पिच्छिका का उपयोग जीवों की रक्षा और अहिंसा की भावना के साथ किया जाता है।
पिच्छिका का उद्देश्य
समाजजनों का कहना है कि दिगंबर जैन साधु पिच्छिका का उपयोग सूक्ष्म जीवों की रक्षा के लिए करते हैं। यह उपकरण जैन साधना और संयम का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है तथा इसका उद्देश्य किसी जीव को हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि अहिंसा का पालन करना है।
तथ्यों के आधार पर समाज का पक्ष
जैन समाज के अनुसार देश में लगभग 1500 श्रमण मुनि हैं और प्रत्येक मुनि वर्ष भर में लगभग 500 से 1000 मोरपंखों से निर्मित पिच्छिका का उपयोग करते हैं। समाज का कहना है कि इस आधार पर लाखों मोरों की हत्या या प्रताड़ना का आरोप तथ्यात्मक रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता, क्योंकि मोर अपने प्राकृतिक जीवनचक्र में स्वयं पंख छोड़ते हैं, जिन्हें परंपरागत रूप से संग्रहित किया जाता रहा है।
संवेदनशीलता और अध्ययन की आवश्यकता
समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से पूर्व उसके ऐतिहासिक, धार्मिक और व्यावहारिक पक्षों का समुचित अध्ययन किया जाना चाहिए। करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े विषयों पर तथ्यात्मक एवं संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।
अहिंसा और जीवदया का प्रतीक
जैन समाज का मानना है कि मोरपंख किसी हिंसा का नहीं, बल्कि अहिंसा, करुणा और जीवदया का प्रतीक है। समाज ने कहा कि बिना पूर्ण तथ्यों के की गई टिप्पणियाँ लाखों अहिंसक श्रावकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती हैं।
संवाद को मिले प्राथमिकता
समाजजनों ने आग्रह किया कि ऐसे विषयों पर आरोप-प्रत्यारोप के बजाय संवाद, अध्ययन और तथ्य आधारित विमर्श को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका मानना है कि यही मार्ग सामाजिक सौहार्द, धार्मिक सम्मान और पारस्परिक समझ को सुदृढ़ करेगा।













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