मेरठ में आयोजित समवसरण महामंडल विधान में आचार्य विमर्शसागर जी ने सन्तान में संस्कार डालने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि धर्म और संस्कार ही परिवार व समाज को जीवित रखते हैं। माता-पिता की जिम्मेदारी सबसे महत्वपूर्ण है। सोनल जैन की रिपोर्ट
मेरठ । मेरठ में चल रहे “श्री 1008 समवसरण महामंडल” विधान के दौरान भावलिंगी संत दिगम्बराचार्य श्री विमर्शसागर जी मुनिराज ने परिवार और समाज को लेकर बेहद महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अगर परिवार और समाज को जिंदा रखना है तो सबसे पहले सन्तान में अच्छे संस्कार डालना जरूरी है।
जिनमंदिर से शुरुआत का संदेश
आचार्य श्री ने कहा कि जब भी सन्तान पहली बार किसी सीढ़ी पर चढ़े, तो वह जिनमंदिर की सीढ़ी होनी चाहिए। यह सन्तान की नहीं बल्कि माता-पिता की जिम्मेदारी है। यदि शुरुआत धर्म से होगी, तो पूरा जीवन भी सही दिशा में जाएगा।
माता-पिता की बड़ी जिम्मेदारी
उन्होंने कहा कि सन्तान के जन्म के 45 दिन बाद उसे जिनमंदिर ले जाना चाहिए, जैसे कोई बड़ा धार्मिक अनुष्ठान करने जा रहे हों। इससे सन्तान के जीवन में प्रारंभ से ही संस्कारों का बीजारोपण होता है।
बिना संस्कार के जीवन अधूरा
आचार्य विमर्शसागर जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज सन्तान जन्म तो ले रही है, लेकिन अगर उसमें संस्कार नहीं हैं तो वह जीवन पशु के समान हो जाता है। संस्कार ही मनुष्य को मनुष्य बनाते हैं और यही उसकी पहचान हैं।
समाज और परिवार पर चेतावनी
उन्होंने कहा कि वह परिवार और समाज मृत समान है, जहां धर्म और संस्कारों की चर्चा नहीं होती। ऐसे वातावरण में न तो धर्म बढ़ता है और न ही महान व्यक्तित्व जन्म लेते हैं।
धर्म से ही जीवंत होगा समाज
आचार्य श्री ने सभी से आग्रह किया कि अपने घर-परिवार में धर्म को स्थान दें, बच्चों को संस्कार दें और समाज को जीवंत बनाएं। यही भविष्य को उज्जवल बनाने का एकमात्र रास्ता है।













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