समाचार

भगवान शीतलनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 15 जनवरी को: तिथि के अनुसार माघ कृष्ण द्वादशी को है


10वें तीर्थकर भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक एक ही दिन जैन पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण द्वादशी को मनाया जाता है। इस वर्ष भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान शीतलनाथ जी की पूजा, अभिषेक, शांतिधारा सहित विधि विधान से आराधना की जाएगी। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट…


इंदौर। भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक एक ही दिन जैन पंचांग के अनुसार माघ कृष्ण द्वादशी को मनाया जाता है। इस वर्ष भगवान शीतलनाथ का जन्म और तप कल्याणक 15 जनवरी 2026 को मनाया जाएगा। किवदंती है कि इसी शुभ तिथि पर पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में माता सुनंदा देवी ने भगवान शीतलनाथ को भद्रिलपुर नगर (वर्तमान झारखंड में इटखोरी) में जन्म दिया था और इसी दिन भगवान ने संसार से वैराग्य प्राप्त कर कोल्हुआ पहाड़ (झारखंड में भी) पर एक हजार राजाओं के साथ जिन दीक्षा (तप) ली थी। जैन धर्मग्रंथों के अनुसार नवें तीर्थंकर के निर्वाण के सुदीर्घ काल के बाद 10वें तीर्थकर श्री शीतलनाथ जी का जन्म हुआ। भद्रिलपुर नरेश दृढरथ एवं महारानी सुनंदादेवी ने प्रभु के जनक -जननी होने का सौभाग्य पाया। माघ कृष्ण द्वादशी के दिन प्रभु का जन्म हुआ। प्रभु जब मात्र गर्भ मे थे। तब किसी समय महाराज दृढरथ को दाह ज्वर हुआ था। उनकी देह ताप से जलने लगी थी। समस्त उपचार विफ़ल हो गए। तब महारानी के हाथों के स्पर्श मात्र से महाराज दाह ज्वर से मुक्त हो गए थे। महाराज ने इसे अपनी भावी संतान का ही पुण्य प्रभाव माना। फ़लतः पुत्र के नामकरण के प्रसंग पर इस घट्ना का वर्णन करते हुए महाराज ने अपने पुत्र का नाम शीतलनाथ रखा। युवावस्था मे कई राजकन्याओं से शीतलनाथ जी का पाणिग्रहण हुआ। पिता द्वारा दीक्षा लेने पर उन्होने राजपद पर आरुढ हो अनेक वर्षाें तक प्रजा का पुत्रवत पालन किया।

माघ कृष्ण द्वादशी के दिन शीतलनाथ ने श्रमणी दीक्षा अंगीकार की

भोगावली कर्म जब समाप्त हो गए तब माघ कृष्ण द्वादशी के दिन शीतलनाथ ने श्रमणी दीक्षा अंगीकार की। तप और ध्यान की तीन मास की स्वल्पावधि में ही प्रभु ने चारों घन घाती कर्माें को अशेष कर केवलज्ञान केवलदर्शन प्राप्त किया। देवों और मानवों ने मिलकर प्रभु का कैवल्य महोत्सव आयोजित किया। प्रभु ने उपस्थित विशाल परिषद के समक्ष धर्म देशना दी। अनेक लोगों ने सर्वविरति एवं अनेकों ने देशविरति धर्म अंगीकार किया। इस प्रकार चतुर्विध तीर्थ की स्थापना की। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान के आनंद आदि 81 गणधर हुए। भगवान के धर्म परिवार में एक लाख साधु, 1 लाख 6 हजार साध्वियां, 2 लाख 89 हजार श्रावक एवं 4 लाख 98 हजार श्राविकाएं थी।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shree Phal News

About the author

Shree Phal News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page