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जहां अनेकांत है वहीं जैन धर्म है : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने वेबिनार में किया जिज्ञासाओं का समाधान


सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अनेकांतवाद, विनय, आत्मज्ञान और जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट।


सागवाड़ा। पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने जैन दर्शन के अनेकांत सिद्धांत, आत्मज्ञान, विनय तथा मोक्ष मार्ग पर विस्तृत प्रवचन दिए। कार्यक्रम में ब्यावर से पधारे जज कमलजी नाहर की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया गया।

अनेकांत ही जैन धर्म की आत्मा

गुरुदेव ने कहा कि किसी भी वस्तु का केवल एक पक्ष स्वीकार करना धर्म के विरुद्ध है। जहां अनेकांत है, वहीं जैन धर्म है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक द्रव्य अनेकांतात्मक है तथा उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य—तीनों का समन्वय ही सत्य है। केवल एक पक्ष को स्वीकार करना मिथ्यात्व है। उन्होंने कहा कि एकांतवाद अहंकार और हठ का प्रतीक है, जबकि अनेकांत आत्मस्वभाव की ओर ले जाकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

विनय से मिलता है आत्मज्ञान

विनयसूत्र के संदर्भ में गुरुदेव ने बताया कि विनम्र शिष्य गुरु का प्रिय बनता है और गुरु प्रसन्न होकर उसे आगम ज्ञान प्रदान करते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे गाय अपने बछड़े से प्रसन्न होकर अधिक दूध देती है, उसी प्रकार योग्य एवं विनयी शिष्य को गुरु भरपूर ज्ञान प्रदान करते हैं।

स्वाध्याय और विनय का महत्व

मूलाचार ग्रंथ के आधार पर गुरुदेव ने कहा कि विनयपूर्वक किया गया स्वाध्याय आत्महित का मार्ग प्रशस्त करता है। आत्मज्ञान से संवर होता है तथा अनंत कर्मों की निर्जरा होती है। उन्होंने कहा कि इच्छाओं पर नियंत्रण ही वास्तविक तप है तथा नवीन वैराग्य और आत्मजागरण का आधार विनय और स्वाध्याय हैं।

ज्ञान और सूचना में अंतर समझाया

गुरुदेव ने कहा कि केवल धार्मिक ग्रंथों को याद कर लेना ज्ञान नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सूचना (डेटा) और ज्ञान में अंतर है। हित-अहित का विवेक ही वास्तविक ज्ञान है। आत्मज्ञान के बिना समस्त जानकारी केवल संसार को बढ़ाने का माध्यम बनती है।

कविता से हुआ मंगलाचरण

वेबिनार का मंगलाचरण मुनि श्री सुविज्ञसागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता— “दुनिया के अंधेरे में ज्योति बनो प्यारे, सत्य बनो, साम्य बनो, शांत बनो प्यारे, स्व-पर विश्व को ज्योतिर्मय करो प्यारे” — के साथ किया। कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा ने दी।

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