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धर्म सभा में दिए उत्तम शौच धर्म पर प्रवचन : लोभ छोड़ो, शौचधर्म स्वीकारो – आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी 


पापों का पिता कोई है तो वह लोभ है । लोभ बड़ा खतरनाक होता है। लोभ अनर्थकारी होता है। लोभ सर्व- अनर्थो का मूल कारण है। लोभ ही पाप, हिंसा, मान, मायाचारी, चोरी, कुशील करवाता है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की यह विशेष रिपोर्ट…         


“पर्वराज पर्युषण महापर्व” पर आयोजित ” श्रावक संस्कार संयम शिविर” में धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा की पापों का पिता कोई है तो वह लोभ है । लोभ बड़ा खतरनाक होता है। लोभ अनर्थकारी होता है। लोभ सर्व- अनर्थो का मूल कारण है। लोभ ही पाप कराता है। लोभ ही हिंसा कराता है, लोभ मान कराता है, लोभ ही मायाचारी कराता है, लोभ ही झूठ बुलबाता है, लोभ ही चोरी कराता है, लोभ ही कुशील कराता संग्रह वृत्ति में प्रवृत्त कराता है। लोभी लोभ के वश सम्पूर्ण-पाप करता है। लोभी के लोभ के कारण ही उसका सर्वनाश होता है।

स्वच्छता, शुचिता, पवित्रता निर्मलता को ही शौच धर्म कहते हैं। कषाय परिणाम से आत्मा मलिन होती है, आत्मा से अशुद्धि को हटाना, मलिनता दूर करना, यही शुचिता है। पवित्रता तभी आयेगी जब तुम परिग्रह से मुख मोड़ लोगे, कषायों को छोड दोगे। चाह ही चिंता बढ़ाती है, चाह ही कषाय भड़काती है। आकांक्षा ही विशुद्धि घटाती है। कामनायें ही कष्ट देती हैं। कामनायें ही बिनाशकारी हैं।

मूल्यवान वस्तु कौन सी 

सबसे अधिक कीमती, मूल्यवान, श्रेष्ठ वस्तु है, तो वह भाव-बिशुद्धि है। जो पवित्र-परिणाम गुरुसेवा, प्रभु भक्ति में होते हैं, ऐसे उच्च-परिणाम लाखों स्वर्ण मुद्रायें व्यय करके भी प्राप्त करना कठिन है। कषाय की एक कणिका से शान्ति भंग हो जाती है। कषाय से बचो, शुचिता प्राप्त करो। लोभी लोभ के वश इतना अधिक श्रम करता है कि- स्वयं को बीमार कर लेता है।

लोभ से, कामना से, कषाय से कोई वस्तु प्राप्त नहीं होती है, जो भी प्राप्त होता है वह पुण्य से होता है और पुण्य दया, करुणा, गुरु सेवा, प्रभु भक्ति और तप से प्राप्त होता है। लोभ छोड़ो, पुण्य बढ़ाओ। निर्लोभ वृत्ति ही शौच धर्म है। शुचिता ही शौच है।

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