दसलक्षण पर्व, जो जैन धर्म के दस महान गुणों के पालन और आत्मशुद्धि के लिए समर्पित है, का समापन अति धूमधाम और आध्यात्मिकता के साथ हुआ। इस पर्व के अंतर्गत जैन धर्मावलंबी दस दिनों तक उत्तम धर्मों का पालन करते हैं, जिनमें क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, और ब्रह्मचर्य जैसे गुण शामिल हैं। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
कुलचराम (हैदराबाद)। दसलक्षण पर्व, जो जैन धर्म के दस महान गुणों के पालन और आत्मशुद्धि के लिए समर्पित है, का समापन अति धूमधाम और आध्यात्मिकता के साथ हुआ। इस पर्व के अंतर्गत जैन धर्मावलंबी दस दिनों तक उत्तम धर्मों का पालन करते हैं, जिनमें क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य, और ब्रह्मचर्य जैसे गुण शामिल हैं। प्रत्येक दिन एक विशेष गुण का पालन किया जाता है, जो आत्मा की शुद्धि और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित है। इस वर्ष, दसलक्षण पर्व के अवसर पर विशेष रूप से उत्तम क्षमा की पूजा का आयोजन किया गया, जिसमें अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज की मंगल आशीर्वचन प्राप्त हुआ।
आचार्य श्री ने अपने प्रवचनों में क्षमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि क्षमा आत्मा को शुद्ध करने का मार्ग है और इससे मनुष्य के जीवन में शांति और समरसता आती है। उन्होंने सभी धर्मावलंबियों को प्रेरित किया कि वे अपने जीवन में क्षमा और सहनशीलता को अपनाएं, जिससे समाज में सद्भावना और मेल-मिलाप की भावना को बढ़ावा मिले। इस दौरान तत्वार्थसूत्र का वाचन भी संपन्न हुआ। तत्वार्थसूत्र, जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो तत्त्वज्ञान और आत्मा की शुद्धि के मार्ग को स्पष्ट करता है। इसके वाचन के दौरान अन्तर्मना आचार्य श्री ने इसकी गहराई से व्याख्या की और श्रोताओं को इसके गूढ़ अर्थों से परिचित कराया। तत्त्वरसूत्र के माध्यम से आत्मा के स्वरूप, कर्म सिद्धांत, मोक्ष, और निर्वाण के मार्ग पर विस्तृत चर्चा की गई।
पूजन और वाचन के समापन के बाद आचार्य श्री ने धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि दसलक्षण पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि और धर्म के मार्ग पर चलने का एक अवसर है। धर्म के दस लक्षणों का पालन करने से मनुष्य न केवल अपने जीवन में शांति और सुख प्राप्त कर सकता है, बल्कि मोक्ष के मार्ग पर भी अग्रसर हो सकता है। पूरे पर्व के दौरान श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया और धर्मानुष्ठानों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। पूजा, व्रत, और ध्यान के माध्यम से सभी ने आत्मशुद्धि का प्रयास किया। अंत में,अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज ने सभी को मंगल आशीर्वाद देते हुए समाज में अहिंसा, करुणा और क्षमा की भावना को बनाए रखने का संदेश दिया।
संल्लेखनारत
मुनि श्री वाङ्गमय सागर जी महाराज
आज लिया सिर्फ जल
समस्त संघ सानिध्य मे प्रतिदिन क्रमशः सभी संघ के द्वारा होती है जिनधर्म चर्चा
4 दिवस पश्चात निर्विघ्न संपन्न हुई पारणा
उभय मासोपवासी साधना महोदधि प.पू. अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्नसागर जी महाराज
त्रिलोकसार व्रत
41 दिन की अवधि जिसमे 30 उपवास 11 पारणा,
24 अगस्त से शुरू, 04 अक्टूबर को महापारणा होगी!
उपाध्याय श्री पीयूशसागर जी महाराज
मुक्तावली व्रत
62 दिन, 49 उपवास 13 पारणा,एक उपवास से 7 उपवास तक जाना फिर कम करना। सुगंध दशमी को महापारणा होगी।
मुनि श्री परिमलसागर महाराज
मुक्तावली व्रत
62 दिन,49 उपवास 13 पारणा,एक उपवास से 7 उपवास तक जाना फिर कम करना। सुगंध दशमी को महापारणा होगी













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