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मित्रता में समता भाव आता हैः चिंतामणि रत्न समान मानव पर्याय का प्रतिक्षण अनमोल है-मुनि संयत सागरजी 


मानव जीवन दुर्लभ चिंता मणि रत्न के समान है। बड़े भाग्य से नर तन पाया मनुष्य कुल पर्याय मिली। श्री जिनवर के दर्शन करने जिनवाणी की राह मिली। मानव जीवन का प्रत्येक क्षण अनमोल है। सदैव सकारात्मक रहते हुए निर्मल परिणामों को बनाए रखे। संसार के प्राणी मात्र से मैत्री भाव बनाए रखे। उक्त उदगार मुनिश्री संयत सागरजी ने आर के पुरम, त्रिकाल चौबीसी, जैन मंदिर में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुवे व्यक्त किए। पढ़िए कोटा़ से पारस जैन, पार्श्वमणि की पूरी खबर…


कोटा (राज) मुनिश्री संयत सागरजी ने आर के पुरम, त्रिकाल चौबीसी, जैन मंदिर में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुवे कहा-‘मानव जीवन का प्रत्येक क्षण अनमोल है। सदैव सकारात्मक रहते हुए निर्मल परिणामों को बनाए रखे। संसार के प्राणी मात्र से मैत्री भाव बनाए रखे।‘ मंदिर समिति के अध्यक्ष अंकित जैन महामंत्री अनुज गोधा कोषाध्यक्ष ज्ञानचंद जैन ने बताया कि धर्मसभा में मंगल दीप प्रज्वलन जे के जैन, मनोज जयसवाल, लोकेश जैन, प्रकाश जैन, पदम जैन, सागरचंद जैन ने किया।

भजन सुनाकर भाव-विभोर किया

धर्म सभा में मंगलाचरण पाठ पारस जैन ने मुनि आए नगरी हमारे पावन हो गई ये धरा रे स्वरचित भजन अपनी सुमधुर आवाज में सुनाकर कर श्रद्धालुओं को भाव विभोर हो झूमने को मजबूर कर दिया। कार्याध्यक्ष प्रकाश जैन ने बताया कि धर्म सभा का संचालन पंडित रविन्द्र शास्त्री ने कर चार चांद लगा दिए।

संसार में सदैव समीचिन मित्रता रखें 

मुनिश्री ने आगे कहा कि जीवन में बंधु बहुत बनाएं परंतु ऐसा बंधु बनाओ जिससे संसार बंधन से मुक्ति मिल जाए। संसार परिभ्रमण का मुख्य कारण राग, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, माया के बंधन ही है। संसार में सदैव समीचिन मित्रता रखें। मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे दिन दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्तोत्र बहे। ये भावना सदैव अंतर्मन में रखनी चाहिए। आगे मुनिश्री ने अपने विचार व्यक्त करते हुवे कहा कि वर्तमान समय में जितने भी आपके मित्र बंधु है एक दिन सभी शत्रु हो जाएंगे क्योंकि मानव जीवन में इच्छाएं व आकांक्षाएं अनंत है वो कभी पूरी नहीं हो सकती।

मित्रता में समता भाव आता है

जीवन में समीचिन मित्रता में समता भाव आ जाता है। जीवन में संत के सानिध्य से मानव भले हो संत न बने परन्तु संतोषी तो बन ही जाता है। कहा भी गया है जब आए संतोष धन सब धन धुरी समान। संसार का जितना भी वैभव, संपति, धन, दौलत, सोना, चांदी सब धूल के समान दिखाई देने लग जाते है। जब संतोष रूपी धन अंतर्मन में समाता है।

मुनिश्री आर के पुरम आए

मंदिर समिति के अध्यक्ष अंकित जैन ने बताया कि आचार्य 108 विशुद्ध सागरजी महाराज के शिष्य मुनिवर 108 संयत सागरजी ससंघ का दोपहर 2.30 बजे रिद्धि-सिद्धि नगर के लिए मंगल विहार हो गया। मुनिश्री ससंघ रावतभाटा से मंगल पद विहार करते हुवे आर के पुरम जैन मंदिर आए।

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