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सभ्यता और सत्यता ये दोनों विरोधी हैं : मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में सभ्यता और सत्यता के महत्व को किया प्रतिपादित 


मुनिश्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकजुट होते हैं। उनके प्रवचन नित नई चेतना से पूर्ण वाणी का रसपान करवाते हैं। गुरुवार को उन्होंने सत्यता और सभ्यता के साथ व्यवहारिकता के बारे में भी बताया। गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह रिपोर्ट…


गोसलपुर। कभी-कभी भावनाएं सिद्धांत और सत्य से परे हो जाती है, भावनाएं कई बार सिद्धांत का भी उल्लंघन कर देती है, इसलिए भावनाओं को सदा सत्य स्वरूप ही माना जाये, ये नियम नहीं और भावनाएं सदा सही ही निकले ऐसा नियम नहीं। कोई बुरी भावना से देख रहा है या कुछ कर रहा है तो डरना नहीं कि ये भावनायें हमारा बुरा ही कर देंगी। बस यही तो धर्म अपन को चाहिए कि हमारे लिए कोई कितनी भी बुरी रैकी दे, बुरी भावना करे, बुरा सोचे लेकिन अपना उपादान इतना मजबूत कर लो कि दुश्मन की बद्दुआ भी हमारा कुछ न बिगाड़ पाये। यह बात मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। तुम यह मत चाहो कि हमारे लिए कौन प्रतिकूल है, तुम यह मत सोचो कि हमारा अच्छा दिन कैसे आएगा, धर्म में अच्छा दिन लाने की ताकत नहीं है। कोई ऐसा मुहूर्त या मंत्र नहीं जिसके करने से अच्छे दिन आ जाते हो।

मेरी संपत्ति भी महाराज की है, इसको बोलते है सभ्यता

सभ्यता और सत्यता ये दोनों विरोधी है लेकिन दोनों के बिना जिंदगी नहीं चलेगी। साधु के मकान जायदाद, परिवार नहीं फिर भी भक्त कहते हैं कि महाराज ये आपका ही मकान है, आपकी की दुकान है, ये कितना झूठ बोलते है। भक्त कहता है कि जब मैं महाराज का हूँ तो मेरी संपत्ति भी महाराज की है, इसको बोलते है सभ्यता। पूज्यपाद स्वामी जिनेन्द्र भगवान की संपत्ति को अपनी संपत्ति कहते है, यह कैसे संभव है क्योंकि जिनेन्द्र भगवान तो तुमसे भिन्न है। उन्होंने कहा कि मैं भगवान का भक्त हूँ और वो मेरे भगवान है, मैंने आज तक किसी दूसरे देवता को भगवान नहीं माना और जब जिनेंद्र भगवान मेरे हैं तो जिनेन्द्र भगवान की संपत्ति भी मेरी है, कोई बाधा नहीं लेकिन ये सत्य नहीं, सभ्यता है।

यदि बाप जुआरी है तो उसको बेदखल कर दो

कभी भी भूलकर के माता पिता की सम्पत्ति पर अपना नाम चढ़वाने का भाव नहीं करना, चाहे करोड़ांे, अरबों की सम्पत्ति हो या अयोध्या का राज्य हो, कभी भी ये भाव नहीं करना कि पिता की संपत्ति पर मेरा नाम चढ़ जाए क्योंकि, अब पिताजी मम्मी की उम्र ज्यादा नहीं रही, क्या पता कब मरण को प्राप्त हो जाये। महानुभाव मत घबराना, मैं तुम्हे सब दिलवाऊंगा, उससे कई गुना दिलवाऊंगा, बस तुम्हें एक नियम लेना है, अच्छे माता पिता जो कभी पाप या अधर्म नही करते, जुआ नही खेलते, व्यसनी नहीं है। यदि आपके माता-पिता शराबी हैं तो जैसे बने तैसे पिता का नाम हटवा करके तुम अपना नाम चढ़वा लेना, मेरा आशीर्वाद है, यदि मेरे भक्त हो तो। यही सबसे बड़ा धर्म होगा पिता के प्रति क्योंकि संपत्ति बचेगी नहीं तो वो क्या पाप कर लेगा। यदि बाप जुआरी है तो उसको बेदखल कर दो संपत्ति से, जैसे बने तैसे, बस तुम्हें सिद्ध करना है कि मेरा पिता व्यसनी है, मेरे पिता को गलत शौक है।

अहो भाग्यशाली मानना कि मैंने कितना पुण्य किया 

दो प्रकार की संपत्ति को कभी अपने नाम मत चढ़ावाना- एक तुम्हारा पिता बहुत धर्मात्मा हो, दानी हो, तुम्हें ये भी डाउट है कि मेरा पिता इतना धर्मात्मा है की पूरी संपत्ति दान में दे देगा और ओवर अलग बोलेगा कि पूरी जिंदगी हम कमाकर कमाकर चुकाते रहे तो भी बेटा तुम अपने आप को अहो भाग्यशाली मानना कि मैंने कितना पुण्य किया है जो मुझे ऐसा पिता मिला। जब तुम्हारे मम्मी पापा तुम्हारा घर का गार्जियन इस प्रकार के दान की बात करें तो तुम्हारे मन में आनंद आ जाए, जाओ तुम्हारी चक्रवर्ती बनने का रिजर्वेशन हो गया, जाओ तुम्हारी अच्छे दिन आ गए तुम माटी छुओगे और सोना हों जाएगा।

अपने माथे पर सिकन मत लाना,

यदि तुम्हारा पति कोई अच्छा कार्य, अच्छा धर्म करके आए तो अपने आपको भाग्यशाली मानना, जाओ तुम्हारा सुहाग अखंड रहेगा, तुम्हारे जीवन मे कभी कष्ट नहीं आएगा। बेटों से कहना है कि यदि तुम्हारे ऐसा बाप मिल जाये जो अच्छे कार्य के कारण कहे कि तुम्हें एक कोड़ी भी नहीं मिलेगी, बस अपने माथे पर सिकन मत लाना, इतना कह देना मेरे अहोभाग्य है- दुनिया के पापी बाप है और मेरा बाप धर्मात्मा है, जाओ मैं ऐसा आशीर्वाद दूंगा कि तुम माटी छुओगे और वो सोना बन जाएगा।

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