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चातुर्मासिक प्रवचन में बह रही ज्ञान की गंगा : साधुओं की तप साधना में सहायक होने पर पुण्य का संचय होता है – विज्ञानमति माताजी


उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक कार्यों में पाप का संचय किंतु साधुओं की तप साधना में सहायक होने पर पुण्य का संचय होता है। आप प्रतिदिन स्वयं के लिए घर में भोजन बनाते हैं, अग्नि जलाकर इससे पाप का बंध होता है। उस भोजन को आप अगर साधुओं की आहार चर्या का अंग बनाते हैं तो रत्नत्रय की ओर बढ़ रहे मुनियों की तप साधना में आप सहायक होते हैं। इससे आपको पुण्य का बंध होता है। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट…


इंदौर। उदयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन के माध्यम से धर्म और ज्ञान की गंगा बहा रहीं वंदनीय आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने धर्म सभा में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि…

1. अतिथि संविभाग व्रत शास्त्रों के अनुसार 4 शिक्षा व्रतों में से एक व्रत है। इसमें बिना अतिथि को भोजन दिए बिना भोजन करना निषिद्ध है। यह श्रावक का एक बहुत बड़ा धर्म है या कहें कि बहुत बड़ा व्रत है। घर में बने हुए भोजन में अतिथि के लिए भोजन हो। और अतिथि को भोजन कराने के बाद ही वह भोजन करें। आपके गांव, आपके नगर में साधु, साध्वी ,श्रावक श्राविका जो पधारे हैं, तो आप नवधा भक्ति पूर्वक साधु और साध्वी को प्रातः काल में पड़गाहन पूर्वक आहार करवाएं और संध्या काल में जो व्रति ब्रह्मचारी भैया और ब्रह्मचारिणी बहने हैं, उनसे भोजन हेतु निवेदन करें। अतिथि संविभाग व्रत का पालन करने से बहुत पुण्य मिलता है।

2. सांसारिक कार्यों में पाप का संचय किंतु साधुओं की तप साधना में सहायक होने पर पुण्य का संचय होता है। आप प्रतिदिन स्वयं के लिए घर में भोजन बनाते हैं, अग्नि जलाकर इससे पाप का बंध होता है। उस भोजन को आप अगर साधुओं की आहार चर्या का अंग बनाते हैं तो रत्नत्रय की ओर बढ़ रहे मुनियों की तप साधना में आप सहायक होते हैं। इससे आपको पुण्य का बंध होता है। आहार दान की महिमा इतनी विशाल, इतनी विराट है, यह राजा श्रेणिक की कथा से स्पष्ट होता है कि जब राजा श्रेणिक ने प्रथम आहार दिया तो उन्होंने रत्नत्रय धारी जिन लिंगी महामुनिराज जो कि तीर्थंकर होने वाले हैं, उन्हें प्रथम आहार दिया, इस प्रकार स्वयं राजा श्रेणिक ने महा पुण्य का संचय किया और स्वयं के लिए भी रत्नत्रय के द्वार खोल लिए। इसी प्रकार जब आप घर में कपड़े धोते हैं, घर में झाड़ूू-पोंछा करते हैं तो इससे असंकल्पित हिंसा होती है। लेकिन हिंसा तो हिंसा है। और यह हिंसा रूपी पाप कर्म आपके साथ में जुड़ जाते हैं। किंतु आप अगर मंदिर जी में विवेक पूर्वक कोमल मृदुता वाली झाड़ूू और पोंछे से चैत्यालयों का सफाई कार्य करते हैं तो आप घर में हुए हिंसा रूपी पाप के दोष से बच जाते हैं।

3. श्रावक के 4 धर्म पूजा, उपवास, दान और शील हैं। ये श्रावक के प्रमुख चार धर्म हैं। इन धर्मों के पालन करने से अतिशय होते हैं। यह कई कथानक में और कई स्थानों पर हुआ हैl नवधा भक्ति करते हुए आहार दान देने से कई बार देवों द्वारा उन स्थानों पर पृथ्वीकायिक, पुष्प और रत्नों वर्षा हुई। ऐसा कई कथाओं में आता है। ऐसा नहीं है कि स्वाध्याय का अपना स्थान नहीं है स्वाध्याय से हम विवेक पूर्वक, ज्ञान पूर्वक कार्य कर सकते हैं किंतु दान शील, उपवास, और पूजा यह व्यवहार है। अतः व्यवहार और निश्चय, दोनों के पंखों से धर्म की उड़ान बहुत ऊंची हो सकती है।

4. भाव लिंगी और द्रव्य लिंगी क्या है, कई बार लोगों के मन में आता है कि जो अच्छे प्रवचन करें। अच्छे उपदेश दे वह भाव लेंगी होते हैं। यह श्रद्धा कथांचित 100 प्रतिशत सही नहीं है। हमें जिनेंद्र भगवान की वाणी के ऊपर पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिए और वे मुनि जो कि जिन लिंग धारी हैं, जो 28 मूल गुणों का पालन करते हैं, वे हमारे लिए पूजनीय हैं।

5. साधु को उनकी चर्या के विरुद्ध किसी भी प्रकार की सामग्री उपलब्ध नहीं करानी चाहिए। साधु के लिए संयम उपकरण पिच्छिका, कमंडल और अध्ययन एवं स्वाध्याय हेतु ग्रंथ उपलब्ध कराना यह श्रावक का धर्म है। किंतु कुछ अनावश्यक वस्तुएं हैं जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और उनसे संबंधित चीजें विशेष रुप से आपको इन कार्यों से बचना चाहिए।

6. उद्दिष्ट दोष को जानें। शास्त्रों में वर्णन आता है। दरअसल में उदिष्ठ भोजन का दोष श्रावकों कब लगता है। जब वह किसी भी प्रकार का भोजन नाग, यक्ष अथवा पाखंडी मिथ्या दृष्टि साधुओं के लिए बनाते हैं तो यह उद्दिष्ट का दोष श्रावको को लगता है। साधु जिन्हें हम सच्चा साधु कहते हैं, वह कभी भी भोजन हेतु याचना आग्रह या पसंद नापसंद नहीं कहता है। साधु का भोजन करने का प्रयोजन सिर्फ एक मात्र होता है कि उसे रत्नत्रय की साधना करना है। इसीलिए जो भोजन उसके रत्नत्रय पालन में ईंधन के रूप में कार्य करें, वह उसके लिए उपयोगी है। किंतु साधु अगर कृत कार्य अनुमोदना और मन वचन काय से उस भोजन के साथ में जुड़ता है तो यह उद्दिष्ट है।

7. साधु को आहार करवाते समय श्रावक को मां के समान व्यवहार रखना चाहिए। जिस प्रकार मां अपने बच्चों को जो कि सीए, डॉक्टर, इंजीनियर बनने के लिए अध्ययनरत होती है, ऐसा भोजन परोसती है, जिससे उसका दिमाग हमेशा चेतन अवस्था में रहे। ऐसा भोजन नहीं देती, जिससे उसे नींद आए जो जिससे उसके ज्ञानार्जन में दिक्कत हो। इसी प्रकार जब हम साधु के लिए भोजन की व्यवस्था करते हैं तो हमें ध्यान देना चाहिए कि अगर साधु लंबा विहार करके आ रहे हैं तो ऐसा भोजन प्रदान किया जाए जो कि ठोस हो। साधु ने अगर उपवास किए हैं और उस उपवास की पारणा में वह आहार तैयार करना चाहिए जो कि उनके उपवास उपरांत तप साधना में बाधक ना हो। सावन के महीने में जब हम वात्सल्य पर्व रक्षाबंधन मनाते हैं तो कथा अनुसार जब सात सौ मुनियों के ऊपर विपत्ति आई और विष्णुकुमार ने रक्षा की उसके उपरांत श्रावकों ने नवधा भक्ति पूर्वक उन्हें सिव्वैंया का आहार दिया ताकि आहार करते समय उनके रुंधे गलों में तकलीफ न हो। इसी प्रकार चंद्रगुप्त को देवों ने हार दिया। आदिनाथ भगवान को गन्ने का रस दिया गया क्योंकि उन्हें 6 माह बाद आहार संभव हो पाया था। स्मरण रहे साधु अगर अवधि ज्ञानी भी है तो वह आहर के लिए अवधि ज्ञान लगाकर यह नहीं देख सकता कि उसे किस प्रकार का आहार प्राप्त होने वाला है और कौन उसे आहार देने वाला है, यह आगम में निषेध है। गृहस्थ श्रावक को आहार तो देना ही चाहिए, साथ ही स्वाध्याय भी करना चाहिए ।

मुनि महाराज न तो अभिषेक कर सकते हैं और न ही आहार दे सकते हैं। आत्म शुद्धि के लिए स्व आलोचना एवं प्रतिक्रमण आवश्यक है। सम्यकदृष्टि जीव विशाल हृदय वाला होता है। धर्म पालन के लिए व्यवहार तथा निश्चय दोनों आवश्यक है।

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