तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। चैत्र शुक्ल दशमी का यह पावन दिन जैन जगत के लिए दोहरी खुशियों और आध्यात्मिक चेतना का अवसर लेकर आता है। चैत्र शुक्ल दशमी के दिन भगवान के जन्म और तप कल्याणक मनाया जाता है। इस बार यह 12 अप्रैल को आ रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित, संयोजित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। तीर्थंकर मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर हैं। चैत्र शुक्ल दशमी का यह पावन दिन जैन जगत के लिए दोहरी खुशियों और आध्यात्मिक चेतना का अवसर लेकर आता है। आज ही के दिन प्रभु का जन्म कल्याणक और दीक्षा (तप) कल्याणक मनाया जाता है। यह दिन हमें सिखाता है कि कैसे राजसी सुखों के बीच रहकर भी आत्मा को परमात्मा बनाने की यात्रा शुरू की जाती है। भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का जन्म मगध देश की प्रसिद्ध नगरी राजगृह में हुआ था। इनके पिता राजा सुमित्र और माता रानी पद्मावती थीं।
अद्भुत आभा: प्रभु के शरीर का वर्ण ‘नीलमणि’ के समान श्यामल (नीला) था।
चिह्न: उनका लक्षण ’कछुआ (कूर्म)’ है, जो हमें अपनी इंद्रियों को समेटकर अंतर्मुखी होने का संदेश देता है।
अनुशासन का प्रतीक: मुनिसुव्रतनाथ जी के काल में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का भी अस्तित्व माना जाता है, जिससे यह काल नैतिकता और अनुशासन के चरमोत्कर्ष का प्रतीक है। जब प्रभु का जन्म हुआ, तब इंद्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया और संपूर्ण विश्व में सुख-शांति की लहर दौड़ गई।
वैराग्य की ओर कदम: तप कल्याणक का संदेश
भोग से योग की ओर संक्रमण ही जैन धर्म का मूल है। भगवान मुनिसुव्रतनाथ ने हजारों वर्षों तक राज्य संचालन किया, लेकिन उनके भीतर वैराग्य की लौ सदैव प्रज्वलित रही। जैसे कमल जल में रहकर भी उससे अछूता रहता है, वैसे ही प्रभु राजसी वैभव में रहकर भी विरक्त रहे।
चैत्र शुक्ल दशमी के दिन ही उन्होंने दीक्षा ग्रहण की। प्रभु ने सांसरिक मोह-माया का त्याग कर ‘नील’ नामक वन में जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण की। उनके साथ हजारों राजाओं ने भी आत्म-कल्याण का मार्ग चुना। यह तप कल्याणक हमें याद दिलाता है कि वास्तविक शक्ति बाहरी विजय में नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर विजय प्राप्त करने में है।
आज के दिन कैसे बढ़ाएं भक्ति प्रभावना?
इस विशेष अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं को अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाने के लिए यह क्रियाएँ करनी चाहिए।
अभिषेक एवं शांतिधारा: प्रातः काल जिनालय जाकर प्रभु का केसरिया जल से अभिषेक करें।
पूजन और अर्घ्य: मुनिसुव्रतनाथ पूजन के माध्यम से उनके गुणों का स्तवन करें और विशेष अर्घ्य समर्पित करें।
सामायिक और ध्यान: कम से कम 48 मिनट का मौन रखकर प्रभु के स्वरूप का ध्यान करें।
शनि दोष निवारण: जैन परंपरा में मान्यता है कि भगवान मुनिसुव्रतनाथ की भक्ति करने से शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं, क्योंकि वे न्याय और अनुशासन के स्वामी हैं।
निष्कर्ष: प्रभु का मार्ग ही सच्चा मार्ग
भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का जीवन हमें ‘व्रत’ की महिमा सिखाता है। उनके नाम में ही ‘मुनि’ और ‘सुव्रत’ (श्रेष्ठ व्रत) समाहित है। आज के इस आपाधापी भरे युग में प्रभु का संयम और तप हमें मानसिक शांति और सही दिशा प्रदान कर सकता है। आइए, इस चैत्र शुक्ल दशमी पर हम संकल्प लें कि हम भी प्रभु के बताए मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन में अल्प मात्रा में ही सही, पर ‘व्रत’ और ‘नियम’ को स्थान देंगे।













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