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मयूर पंख पिच्छिका पर बड़े बोल : (कु)विख्यात दीदी के बेतुके आरोप का प्रमाणिक और अहिंसक खंडन


जैन मुनियों की पिच्छिका की वजह से हर साल 15 लाख मोरों की हत्या की जाती है। यह बात पूरी तरह से आधारहीन और सरासर झूठ है। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह रिपोर्ट…


इंदौर। इन दिनों देश में हुड़दंग मचाने वालों को जोर चल रहा है। घटिया तरीके से सस्ती प्रसिद्धि पाने के लिए आप किसी के बारे में कुछ भी बोल दो, आप सही बोल रहे गलत बोल रहेज़ इससे किसी को कोई मतलब नहीं है। इस दौर में सिर्फ यह देखा जा रहा है कि सोशल मीडिया पर आपके व्यूह कितने बढ़ रहे हैं। इस विपरित माहौल में भारत की धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत अपना वजूद खोती जा रही है।

 सस्ती प्रसिद्धि के दुष्परिणाम

पहले तो सिरफिरे लोग सोशल मीडिया पर सस्ती प्रसिद्धि के लिए किसी भी धर्म, संस्कृति, समाज, व्यक्ति के बारे में कुछ भी अनर्गल बिगड़े बोल बोल कर अपने व्यूह बढ़ाने का खेल खेल रहे थे, परन्तु अब तथाकथित बुद्धिजीवी, विद्वान और नेता लोग भी इसी भीड़ में शामिल होने लगें। हाल ही में भाजपा नेत्री मेनका गांधी का बेतुका बयान आया जिसमें उनकी वर्षों पूरानी पशु अधिकारवादी, सामाजिक कार्यकर्ता की छवि को धूमिल कर दिया है। उन्होंने कहा कि जैन मुनियों की पिच्छिका की वजह से हर साल 15 लाख मोरों की हत्या की जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता और वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने कहा कि यह बात पूरी तरह से आधारहीन और सरासर झूठ है। जिसका प्रमाणिक और तथ्यात्मक विश्लेषण इस प्रकार हैं। जिसकी जानकारी तथाकथित बुद्धिजीवी दीदी को होना चाहिए।

दीदी का दावा और सही तथ्य 15 लाख मोरों की हत्या 

भारत में मोर की आबादी पिछले 25 साल में 124% बढ़ी है। एक सर्वे के अनुसार तमिलनाडु में ही न्यूनतम 38 लाख मोर हैं। यदि 15 लाख मारे जाते तो प्रजाति विलुप्ति के कगार पर होती, न कि “रैपिड इनक्रीज” में।

 पिच्छिका हत्या का कारण नहीं

पिच्छिका सिर्फ स्वेच्छा से गिरे पंखों से बनती है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 में भी सिर्फ गिरे पंख का व्यापार कानूनी है। जबरन नोचना अपराध है और इससे मोर की मौत होती है। जिसे जैन समाज को दुधमुंहा बच्चा भी पसंद नहीं करेगा तब फिर जैन श्रावक और साधु-संतों की बात तो बहुत दूर कि बात है।

 साधु और हिंसा

बड़ा ही हास्यास्पद कथन हैं, जिस अहिंसक शैली के लिए हमारे संत विश्व स्तर पर पूजे जातें हैं और जैन धर्म का मूल ही “अहिंसा परमो धर्म” है। एक इन्द्रिय से 5 इन्द्रिय तक के जीव की रक्षा के लिए पूरी जीवन-चर्या तय है। पिच्छिका इसी का जीवंत उदाहरण है। इस पिच्छिका से जैन संत उठते बैठते अपने दैनिक व्यवहार में हजारों ऐसे सुक्ष्म जीव की रक्षा करते हैं जिन्हें हम लोग तो अपनी आंखें से देख भी नहीं पाते।

 पिच्छिका अहिंसा का वैज्ञानिक उपकरण 

दिगम्बर जैन मुनि के पास मात्र 3 वस्तुएं होती हैं- पिच्छिका, कमंडलु, शास्त्र। पिच्छिका का उद्देश्य ही हिंसा रोकना है, करना नहीं। इसके लिए जैन संतों की दैनिक जीवन पद्धति जो कि पूरी तरह से आध्यात्मिक वैज्ञानिक और प्रकृति प्रेमी हैं उसे समझना बहुत जरूरी है। दीदी यदि इन संतों जीवनशैली को भले ही अपनाएं नहीं सिर्फ इस मुनि आर्यिका माताजी के साथ मात्र दो-चार दिन रह कर देख लें तो उन्हें अपनी ग़लती का एहसास हो जाएगा। किसी को कुछ कहने दिखाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

 सिर्फ मयूर-पंख ही क्यों ?

सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव रक्षा के मुख्य उद्देश्य को लेकर मोर पंख का चयन प्राचीन का से किया जा रहा है क्योंकि मोर पंख के रेशे इतने कोमल होते हैं कि चींटी जैसे छोटे-छोटे जीव को उससे हटाने पर उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता वही इसके रेशे यदि हमारी आंख कि पलकों पर भी चलाएं तो दर्द नहीं होता। साधु उठने-बैठने से पहले भूमि को पिच्छिका से साफ करते हैं ताकि कोई चींटी, कीड़ा या निगोदिया जीव न दबे।

 पंखों का स्व-विसर्जन किया जाता है।

मोर हर साल बारिश के मौसम के बाद अथवा अगस्त-सितंबर में सारे पंख खुद गिरा देता है। जिनकी संख्या लगभग 150-200 होती है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, इसमें उन्हें कष्ट नहीं होता बल्कि वे अपने नये पंखों को प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं। जैन श्रावक अन्य लोग जंगल में गिरे पंख उठाकर लाते हैं। पिच्छिका उसी से बनती है।

 पंखों को नोचना और तथ्यात्मक जानकारी

पंखों को खींचने और नौंचने से मोरों असीम कष्ट होता है। वहीं नौंचे गये पंख चूंकि मोर के शरीर से जुड़े होते हैं तो उनके साथ खून और मांस लगा होता है, जो आसानी से साफ नहीं किया जा सकता। साफ करने पर भी ख़ून के धब्बे उसकी डंडी पर साफ दिखाई देगा। यदि धब्बे वाले हिस्से को तोड़ कर अलग किया जाता है तो वह पंख इतना छोटा हो जाएगा कि वह पिच्छिका बनाने के काम में ही नहीं आ सकेगा। अतः पंखों को नोच कर पिच्छिका बनाने की बात भी पूरी तरह से तथ्यहीन है।

 15 लाख की गप्प और पंखों का गणित

एक मोर एक वर्ष में लगभग 200 पंखों को स्वेच्छा से विसर्जित (परिवर्तन) करता है। यदि दीदी की बात को मानते हैं तो 15 लाख मोर मारे जाते हैं तो इस हिसाब से सिर्फ भारत वर्ष में एक करोड़ से अधिक मोर होना चाहिए। इस गणित पर विचार करें तो दो सौ करोड (200,00,00,000) पंख एक वर्ष में मोर स्वेच्छा से छोड़ देते हैं।

 प्रमाणिक विवरण

अब पिच्छिका की बात कर लेते हैं, मुनिराज की पिच्छिका 900 पंख एवं आर्यिका माताजी (साध्वी) की पिच्छिका 600 से 750 पंख लगते हैं। इस हिसाब से औसत 700 पंख एक पिच्छिका के लिए चाहिए। पूरे भारत में दिगम्बर मुनि/आर्यिका की संख्या कुछ हजार है। अगर हर एक के पास 900 पंख की 1 पिच्छिका भी माने और साल में 1 बार बदले, तब भी 900 × 5000 = 45 लाख पंख चाहिए। एक मोर साल में 200 पंख गिराता है, इस दृष्टि से 22-23 हजार मोर के गिरे पंख पर्याप्त जबकि, भारत में मोरों की संख्या न्यूनतम 38 लाख है और 6% सालाना बढ़ रही है। इस गणित से भी हत्या की जरूरत ही नहीं पड़ेगी । यह सभी संख्या हमने अधिक से अधिक ली है। अतः 15 लाख का आंकड़ा ही इस बात को साबित कर देता है कि सब कुछ मनगढ़ंत है। जबकि जैन संत कि पिच्छिका बगैर एक भी मोर की हत्या के ही बनाई जाती है। यह एक प्रमाणिक और तथ्यात्मक बात है इसमें कोई गप्प और मनगढ़ंत बात नहीं है।

 मयूर पंख का अन्य उपयोग

मयूर पंख देश में सिर्फ जैन संतों की पिच्छिका के लिए ही काम नहीं आते बल्कि अन्य धार्मिक व सामाजिक उपयोग में भी इनका प्रचुर मात्रा में उपयोग किया जाता है। श्री कृष्ण के तो मुकुट की शोभा ही मयूर पंख से है, स्वामीनारायण मंदिरों में, अन्य हिन्दू मंदिरों में, टोने-टोटके, ज्योतिष, वास्तु, मजारों पर और साथ सजावट के कार्यों में भी इनका उपयोग किया जाता है। धार्मिक कार्यों को छोड़ कर सरकार साथ सजावट के कार्यों में होने वाले उपयोग को क्यों बन्द नहीं करवाती?

 मोरों की मृत्यु के कारण

मोरों की मृत्यु करेंट लगने से, जहरीली खाद्य सामग्री खानें हैं, पेस्टिसाइड के अंधाधुंध उपयोग की चपेट में आने से, मोरों के शिकार करने से होती है। जिन्हें रोका जाना चाहिए।

 हत्या का बयान सरकार कटघरे में 

देश की सबसे बड़ी और रूलिंग पार्टी के वरिष्ठ नेत्री जब यह बात कहती हैं की देश में पंद्रह लाख राष्ट्रीय पक्षी (मोर) प्रति वर्ष मारे जाते हैं तो सत्ताधारी सरकार के लिए यह एक जोरदार तमाचा है, जो सरकार अपने शासन काल में राष्ट्रीय पक्षी की रक्षा नहीं कर सकती।उसके लिए इससे बड़ी शर्म की बात क्या हो सकती है। मेनका गांधी ने अपनी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार से इस आरोप के जबाब की भी अपेक्षा है।

 रोज 4109 एफआईआर

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 में भी सिर्फ गिरे पंख का व्यापार कानूनी है। यदि 15 लाख मोर मारे जाते हैं तो देश में 4109 एफआईआर प्रतिदिन होनी चाहिए जबकि, एक आध एफआईआर भी मुश्किल से दर्ज होती होगी तो फिर हमारा प्रशासनिक अमला, पुलिस, अधिकारी, कलेक्टर, तहसीलदार, मंत्री, औसांसद, विधायक, सरपंच आदि क्या तमाशा देख रहे हैं। या तो दीदी झूठ बोल रही है अथवा पूरा का पूरा प्रशासनिक अमला हो रहा है।

 क्षमा वीरस्य भूषणम्

दीदी आपको इस उम्र में भी भारतीय धर्म संस्कृति का व्यवहारिक ज्ञान भी नहीं है और नहीं आपकी विधा का थोड़ा बहुत जरूरी ज्ञान है, जिसके कारण आपको पहचाना जाता है। उसमें भी बहुत अध्ययन की आवश्यकता है। निवेदन है कि आप अपनी गंभीरता का परिचय देते हुए आचार्य भगवंत के पास जाकर क्षमा याचना कर ले और प्रायश्चित ले। उन्हें बहुत ही हल्कापन महसूस होगा और जो बवंडर उठा है उसको सहजता से सहन करने की शक्ति प्राप्त होगी। जैन धर्म बहुत ही सहानुभूतिपूर्ण व्यवहारिक धर्म है यहां गलती की सजा नहीं, गलती को सुधारने का मौका दिया जाता है। इसीलिए यहां क्षमा को वीरों का आभूषण माना जाता है। यहां क्षमा मांगना गिल्टी फील करने अथवा मान सम्मान को ठेस लगने का कारण नहीं माना जाता है बल्कि यहां तो जैन आचार्य मुनि साधु साध्वी और यहां तक कि कुछ श्रावक बन्धु भी दिन में तीन बार सामायिक प्रतिक्रमण करते वक्त प्रकृति (विश्व) के सभी जीवों से अपने द्वारा दैनिक व्यवहार में किसी भी प्रकार की जानी अनजानी गलियों के लिए क्षमा याचना करते हैं वह भी छोटे से छोटे जीव से वहां उनके आत्मसम्मान को कोई ठेस नहीं लगती बल्कि वे क्षमा मांगने के पश्चात अपने आप को बहुत हल्का महसूस करते हैं।

 प्रतिष्ठा और बयान

वैसे भी आप शाकाहार की प्रबल समर्थक है और पशु-पक्षीयों के प्रति आपकी सहानुभूतिपूर्ण अनुमोदनीय है। जैन समाज अहिंसा का प्रबल समर्थक है और आपके शाकाहार समर्थक कार्यो का बहुत बड़ा प्रशंसक हैं। यह गलती आपसे कैसे हो गई यह एक विचारणीय प्रश्न है, इसका जबाब तो आप खुद ही दे सकती है।

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