धरगांव में आयोजित धर्मसभा में आर्यिका रत्न 105 श्री लक्ष्मी भूषण माताजी ने कहा कि मनुष्य के सुख-दुःख, पाप-पुण्य और समृद्धि का आधार उसके स्वयं के कर्म हैं। उन्होंने सदाचार, संयम और देव-शास्त्र-गुरु भक्ति के मार्ग पर चलने का संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी सन्मति जैन काका की यह रिपोर्ट।
धरगांव। परम पूज्य आर्यिका रत्न 105 श्री लक्ष्मी भूषण माताजी, जो वर्तमान में मंडलेश्वर में चातुर्मास कर रही हैं, विहार क्रम के दौरान धरगांव पहुँचीं। यहाँ डॉ. कपिल जैन के निवास पर उनकी आहारचर्या श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ सम्पन्न हुई। इसके उपरांत स्थानीय जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को उनके मंगल प्रवचनों का लाभ प्राप्त हुआ।
कर्म ही सुख-दुःख का वास्तविक कारण
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका श्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख-समृद्धि, कष्ट, पाप और पुण्य किसी बाहरी शक्ति के अधीन नहीं होते, बल्कि उसके स्वयं के कर्मबंध पर निर्भर करते हैं। उन्होंने कहा कि शुभ भाव और श्रेष्ठ आचरण पुण्य का संचय करते हैं, जबकि अशुभ भाव एवं दुष्कर्म दुःख और पाप के कारण बनते हैं।
सदाचार और विवेक अपनाने का आह्वान
माताजी ने श्रद्धालुओं से अपने विचार, वाणी और आचरण को पवित्र बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि सच्चा सुख और आत्मिक शांति तभी प्राप्त हो सकती है, जब जीवन में सदाचार, विनम्रता और विवेक को स्थान दिया जाए।
संयम और धर्म से होती है कर्मों की निर्जरा
आर्यिका श्री ने कहा कि सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर प्रत्येक जीव को देव, शास्त्र और गुरु की भक्ति, अहिंसा तथा संयम का पालन करना चाहिए। यही मार्ग कर्मों की निर्जरा कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाता है।
आत्मचिंतन का दिया संदेश
प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि “जीव स्वयं ही अपने सुख-दुःख का कर्ता है। अपने कर्मों को सुधारकर ही मनुष्य पापों से मुक्त होकर अक्षय सुख की ओर बढ़ सकता है।” उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन एवं धर्म साधना को जीवन का अभिन्न अंग बनाने का आह्वान किया।
बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहे उपस्थित
धर्मसभा में स्थानीय एवं आसपास के क्षेत्रों से आए जैन समाज के वरिष्ठजन, महिला मंडल, युवा मंडल तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने पूज्य माताजी के प्रेरक प्रवचनों का श्रवण कर उन्हें जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।













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