दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -144 काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार हमारे आंतरिक शत्रु हैं : जो मन को वश में कर, परमात्मा से जुड़ता है, वही असली शूरवीर है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 144वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर न होय।

माया तजि भक्ति करें, सूर कहावे सोय॥”


कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति केवल तीर, तलवार, तोप या बंदूक जैसे बाहरी हथियारों से युद्ध करता है, वह सच्चा वीर (शूर) नहीं कहलाता।

सच्चा वीर तो वह है जो माया—यानी मोह, लालच, अहंकार और भौतिक आकर्षण—का त्याग कर, भक्ति और आत्मिक साधना में लीन हो जाता है।

जो मन और इंद्रियों को वश में कर, परमात्मा से जुड़ता है—वही असली शूरवीर है।

कबीरदास जी के अनुसार, वास्तविक युद्ध बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होता है।

यह युद्ध है — काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे आंतरिक शत्रुओं के विरुद्ध।

जो साधक मन की चंचलता, स्वार्थ, और मोह-माया को जीत लेता है,

वही सच्चा भक्त, सच्चा योद्धा, और जीवन का विजेता कहलाता है।

समाज अक्सर बाहरी वीरता—जैसे सैनिक, योद्धा, या नेता—को ही वीर मानता है,

पर कबीर कहते हैं कि जो अपने भीतर के दोषों, अहंकार और मोह से संघर्ष करता है,

वही सच्चा पथप्रदर्शक और आदर्श मनुष्य है।

आज के समय में, जब दुनिया प्रदर्शन, पद, प्रतिष्ठा और प्रतिस्पर्धा को सर्वोपरि मानती है,

यह दोहा हमें आत्म-नियंत्रण, संतुलन, और आत्म-साक्षात्कार की प्रेरणा देता है।

बाहरी शस्त्रों से युद्ध करना आसान हो सकता है,

लेकिन माया, लोभ, और अहंकार से लड़ना कहीं अधिक कठिन है।

जो इन आंतरिक शत्रुओं को पराजित कर लेता है,

वही सच्चा शूरवीर है — वही सच्चा भक्त है।

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