आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ (37 पिच्छिका) का मंगल विहार जारी है। शुक्रवार को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का सुबह 7:15 बजे लालास में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। शाम 5:30 बजे लालास से लगभग 3 किलोमीटर का मंगल विहार कर संघ हुडील पहुंचा। लालास से पढ़िए, श्रीफल साथी डॉ. राजेश पंचोलिया की खबर…
लालास। आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज ससंघ (37 पिच्छिका) का मंगल विहार लगातार जारी है। शुक्रवार 10 जुलाई को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का सुबह 7:15 बजे लालास में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। शाम 5:30 बजे लालास से लगभग 3 किलोमीटर का मंगल विहार कर संघ हुडील पहुंचा। जहां रात्रि विश्राम होगा और शनिवार 11 जुलाई को प्रातः 5:15 बजे हुडील से लगभग 5.3 किलोमीटर का विहार करते हुए आचार्य श्री ससंघ खूड स्थित राज प्राइवेट आईटीआई पहुंचेंगे। आचार्य श्री के मंगल विहार को लेकर मार्ग में श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। विभिन्न स्थानों पर धर्मावलंबी आचार्य श्री के दर्शन, वंदना और मंगल अगवानी की तैयारियों में जुटे हैं।
संयम मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण
आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन तभी सार्थक बनता है, जब उसमें संयम, अहिंसा, आत्मचिंतन और धर्म का समावेश हो। केवल धार्मिक अनुष्ठान करने से नहीं, बल्कि धर्म को अपने व्यवहार और जीवन में उतारने से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा कि संयम मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। जो व्यक्ति अपनी वाणी, मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है, वही सच्चे अर्थों में विजेता होता है।
प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन आत्मचिंतन करे
आचार्य श्री ने कहा असंयम जीवन में अशांति और दुख लाता है, जबकि संयम आत्मविश्वास, संतोष और शांति प्रदान करता है। आचार्य श्री ने कहा कि अहिंसा केवल किसी जीव की हत्या न करने का नाम नहीं है। किसी के प्रति कटु वचन बोलना, द्वेष रखना, अपमान करना या किसी को मानसिक पीड़ा देना भी हिंसा है। सच्चा धर्म वही है, जिसमें प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, मैत्री और दया का भाव हो। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन आत्मचिंतन करना चाहिए।
धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं
आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि दिनभर के अपने विचारों, वाणी और कर्मों का ईमानदारी से मूल्यांकन करें। अपनी गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने का संकल्प लें। जो स्वयं को पहचान लेता है, वही जीवन का वास्तविक मार्ग पा लेता है। आचार्य श्री ने कहा कि धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। धर्म हमारे विचारों की पवित्रता, व्यवहार की मधुरता और जीवन की सादगी में दिखाई देना चाहिए।
दिखावे नहीं, आत्म साधना की आवश्यकता
यदि धर्म हमारे आचरण में नहीं उतरता, तो वह केवल दिखावा बनकर रह जाता है। उन्होंने कहा कि आज समाज को क्रोध नहीं, करुणा; स्वार्थ नहीं, सेवा; हिंसा नहीं, अहिंसा; और दिखावे नहीं, आत्म साधना की आवश्यकता है। जब व्यक्ति संयम, अहिंसा, आत्मचिंतन और धर्म को अपने जीवन का आधार बना लेता है, तब उसका जीवन स्वयं भी सुखी होता है और समाज के लिए भी प्रेरणा बन जाता है।
विशेष धार्मिक आयोजन होंगे
जानकारी के अनुसार 14 से 16 जुलाई तक धोद में आचार्य श्री के 37वें आचार्य पदारोहण दिवस के उपलक्ष्य में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाएंगे, जिनमें प्रवचन, पूजन एवं विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होंगे।













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