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अहारजी में प्राकृत चेतना का भव्य संगम: बुंदेलखंड क्षेत्र के प्राकृत विद्या शिक्षण शिविरों का सामूहिक समापन  


निकटवर्ती जैन तीर्थ अहारजी में प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन द्वारा बुंदेलखंड क्षेत्र में प्राकृत भाषा, जैन संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से 2 से 10 मई तक प्राकृत विद्या शिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। शिविरों का सामूहिक समापन समारोह रविवार को श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र अहारजी में आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। बकस्वाहा से पढ़िए, रत्नेश जैन रागी की यह खबर…


बकस्वाहा। निकटवर्ती जैन तीर्थ अहारजी में प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन द्वारा बुंदेलखंड क्षेत्र में प्राकृत भाषा, जैन संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से 2 से 10 मई तक प्राकृत विद्या शिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। शिविरों का सामूहिक समापन समारोह रविवार को श्री दिगम्बर जैन सिद्धक्षेत्र अहारजी में आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। कार्यक्रम में बुंदेलखंड क्षेत्र के अनेक नगरों से शिविरार्थी, अध्यापक, संयोजक, विद्वान एवं समाजजन बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। उल्लेखनीय है कि यह शिविर आचार्यश्री सुनीलसागरजी महाराज की प्रेरणा से आयोजित किए गए। जिनका उद्देश्य नई पीढ़ी को प्राकृत भाषा, जैन आगमों एवं भारतीय संस्कृति की मूल चेतना से जोड़ना रहा। शिविरों का आयोजन बाजार मंदिर टीकमगढ़, सिविल लाइन टीकमगढ़, पंचायती मंदिर टीकमगढ़, भगवां, बकस्वाहा, हटा, छतरपुर एवं बम्हौरी में किया गया। जहां बच्चों, युवाओं एवं प्रौढ़जनों ने सहभागिता कर प्राकृत भाषा के अध्ययन में रुचि दिखाई।

आधुनिक शिक्षण प्रणाली से जोड़ने का कार्य किया जा रहा 

समारोह का शुभारंभ मंगलाचरण, नवकार महामंत्र एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। विभिन्न शिविरों का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीय संयोजक डॉ. आशीष जैन आचार्य ने बताया कि शिविरों में विद्यार्थियों को प्राकृत भाषा का सरल परिचय, प्राकृत व्याकरण, संभाषण शैली, ब्राह्मी लिपि का प्रारंभिक ज्ञान, जैन धर्म-दर्शन, संस्कारमूलक गीत, प्रश्नोत्तरी एवं रोचक गतिविधियों के माध्यम से शिक्षण दिया गया। उन्होंने बताया कि इन शिविरों का उद्देश्य केवल भाषा सिखाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, संस्कार एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रति श्रद्धा जागृत करना भी है। उन्होंने आगे कहा कि फाउंडेशन द्वारा संचालित पंचवर्षीय प्राकृत अध्ययन पाठ्यक्रम (3$2) के माध्यम से प्राकृत भाषा को व्यवस्थित एवं आधुनिक शिक्षण प्रणाली से जोड़ने का कार्य किया जा रहा है। ऑनलाइन माध्यम से वीडियो, पावर पॉइंट प्रस्तुति, इन्फोग्राफिक्स, प्रश्नोत्तर सामग्री एवं सरल परीक्षा प्रणाली के माध्यम से देशभर के विद्यार्थियों को प्राकृत से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।

कार्यक्रम में क्षेत्र समिति के अध्यक्ष महेन्द्र जैन ने कहा कि अहारजी क्षेत्र सदैव धर्म, शिक्षा और साधना की पवित्र भूमि रहा है। प्राकृत विद्या शिक्षण शिविर जैसे आयोजन समाज में ज्ञान, संस्कार एवं संस्कृति के संरक्षण का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी मोबाइल और आधुनिक जीवनशैली के साथ-साथ अपनी मूल संस्कृति और प्राचीन ज्ञान से भी जुड़े। उन्होंने फाउण्डेशन के प्रयासों की सराहना करते हुए भविष्य में भी हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया।

शिविरों की सफलता एवं स्थानीय समाज के सहयोग पर प्रसन्नता जताई

फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. ऋषभचन्द जैन फौजदार ने कहा कि प्राकृत भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भारतीय अध्यात्म, जैन आगमों और संस्कृति की जीवंत आत्मा है। उन्होंने कहा कि यदि हमें अपनी जड़ों को समझना है, तो प्राकृत भाषा को समझना आवश्यक है, क्योंकि यही भाषा जैनाचार्यों की मूल वाणी रही है। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि प्राकृत अध्ययन के माध्यम से केवल ज्ञान नहीं, बल्कि व्यक्तित्व विकास, शोध, शिक्षण एवं रोजगार के नए अवसर भी विकसित हो सकते हैं। कार्यक्रम में क्षेत्रीय संयोजक डॉ. निर्मल जैन शास्त्री एवं विजय जैन शास्त्री ने भी शिविरों की सफलता एवं स्थानीय समाज के सहयोग पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि समाज के सकारात्मक सहयोग से यह अभियान आने वाले समय में और अधिक व्यापक रूप लेगा।

समारोह का प्रभावी एवं ओजस्वी संचालन डॉ. राजेश जैन शास्त्री द्वारा किया गया, जिन्होंने अपनी प्रभावपूर्ण शैली से कार्यक्रम को प्रेरणादायी एवं व्यवस्थित बनाए रखा। इस अवसर पर पुरस्कार पुण्यार्जक श्रीमती आभा जैन परिवार का विशेष सम्मान प्रशस्ति-पत्र देकर किया गया। साथ ही सभी अध्यापक विद्वानों, स्थानीय संयोजकों, शिविर सहयोगियों तथा विभिन्न शिविरों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त संयोजकों का सम्मान-पत्र, स्मृति-चिह्न एवं अभिनंदन कर सम्मानित किया गया।

प्राकृत भाषा के अध्ययन, संरक्षण एवं प्रसार का संकल्प 

कार्यक्रम के दौरान प्राकृत गीत, विद्यार्थियों की प्रस्तुति, प्राकृत प्रज्ञा प्रतियोगिता के ड्रॉ एवं पुरस्कार वितरण ने वातावरण को अत्यंत उल्लासपूर्ण बना दिया। उपस्थित विद्यार्थियों एवं समाजजनों ने प्राकृत भाषा के अध्ययन, संरक्षण एवं प्रसार का संकल्प लेते हुए इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान किया। समापन में सामूहिक मंगलभावना के साथ सभी प्रतिभागियों ने यह अनुभव व्यक्त किया कि ऐसे शिविर केवल शिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि संस्कृति, ज्ञान और आत्मजागरण की प्रेरक यात्रा हैं, जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रहे हैं।

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