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भगवान पदमप्रभ जी का मोक्ष कल्याणक 5 फरवरी को: तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को आता है 


जैन धर्म के छठवें तीर्थंकर भगवान पदमप्रभ जी का मोक्ष कल्याणक 5 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण के साथ निर्वाण लाडु अर्पित करने की विधियों को पारंपरिक रूप से निर्वहित की जाएंगी। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह खास संकलित और संपादित प्रस्तुति…


इंदौर। जैन धर्म के छठवें तीर्थंकर भगवान पदमप्रभ जी का मोक्ष कल्याणक 5 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण के साथ निर्वाण लाडु अर्पित करने की विधियों को पारंपरिक रूप से निर्वहित की जाएंगी। भगवान पद्मप्रभ जी का मोक्ष कल्याणक तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को आता है। इस दिन मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आदि किए जाएंगे। इंदौर के दिगंबर जैन मंदिरों के अलावा देशभर के मंदिरों में श्रद्धालुओं और श्रावकों द्वारा भगवान की विशेष भक्ति की जाएगी। जैन धर्म के ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार धातकी द्वीप खंड के पूर्व विदेह क्षेत्र में सीता नदी का दक्षिणी तट वत्सदेश है। उनके सुसीमा नगर के अधिपति अपराजित थे। किसी भी दिन के भोगों से विरक्त तार पिहितास्रव जिनेंद्र के पास दीक्षा कर ली। बारह वर्षों का अध्ययन कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। अंत में ऊर्ध्व ग्रेवेयक के प्रियंकर विमान में अहमिंद्र पद प्राप्त हुआ। इसी जम्बूद्वीप की कौशांबी नगरी में धारण महाराज की सुसीमा रानी ने माघ कृष्ण षष्ठी के दिन अहमिंद्र को गर्भ में धारण किया था। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन पुत्र रत्न का जन्म हुआ। इंद्रों ने जन्मोत्सव के बाद उनका नाम पद्मप्रभ रखा। किसी समय द्वारपाल पर हाथी की दशा सुनकर उन्हें अपने पूर्व भावों का ज्ञान हो गया। जिससे भगवान को वैराग्य प्राप्त हो गया। वे देवों द्वारा ‘निवृत्ति’ नाम की पालकी पर बैठकर मनोहर नाम के वन में गए और कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन दीक्षा ले ली।

सम्मेदांचल से मोक्षधाम को किया प्रस्थान 

चैत्र शुक्ल पूर्णिमा के दिन मध्याह्न में छह मास क्वांटम स्थिरांक के चरण हो जाने से भगवान को केवल ज्ञान प्रकट हुआ। बहुत काल तक भव्यों को धर्माेपदेश देने वाले फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी के दिन सम्मेदांचल से मोक्ष को प्राप्त हुए। भगवान पद्मप्रभ ने जैन धर्म और धर्मावलंबियों को धर्म के प्रति समर्पण, संयम, त्याग और तपस्या का दिव्य संदेश देकर अनुग्रहित किया।

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