केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली और प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन के संयुक्त तत्वावधान में जैन तीर्थ नैनागिरि में 25 दिसंबर से 14 जनवरी तक 21 दिवसीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला के तहत नैनागिरि से शैक्षणिक भ्रमण का कार्यक्रम रखा गया। इसमें नैनागिरि, भीमकुंड, जटाशंकर, खजुराहो, नैनागिरि का भ्रमण किया गया। नैनागिरी से पढ़िए, रत्नेश जैन रागी की यह खबर…
नैनागिरि (बकस्वाहा)। केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली और प्राकृत भाषा विकास फाउण्डेशन के संयुक्त तत्वावधान में जैन तीर्थ नैनागिरि में 25 दिसंबर से 14 जनवरी तक 21 दिवसीय प्राकृत भाषा अध्ययन कार्यशाला के तहत नैनागिरि से शैक्षणिक भ्रमण का कार्यक्रम रखा गया। इसमें नैनागिरि, भीमकुंड, जटाशंकर, खजुराहो, नैनागिरि का भ्रमण किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को प्राकृत भाषा, भारतीय स्थापत्य कला, धार्मिक स्थल, पुरातात्विक धरोहर और सांस्कृतिक परम्पराओं से प्रत्यक्ष परिचित कराना था। कार्यशाला के मीडिया प्रभारी राजेश रागी ने बताया कि भ्रमण दल का मार्गदर्शन प्रो. जगतराम भट्टाचार्य (कोलकाता), डॉ. धर्मेंद्र जैन, डॉ. प्रभातकुमार दास और डॉ. सतेंद्रकुमार जैन (जयपुर) ने किया। कार्यशाला के संयोजक डॉ. आशीष जैन (आचार्य, शाहगढ़, सागर) ने सुव्यवस्थित संयोजन किया। 55 प्रतिभागियों ने इस शैक्षणिक भ्रमण में भाग लिया। भ्रमण के दौरान प्रतिभागियों ने भीमकुंड के प्राकृतिक और पौराणिक महत्व, जटाशंकर महादेव मंदिर की शैव साधना परंपरा और स्थापत्य संरचना तथा खजुराहो के हिंदु और जैन मंदिरों की उत्कृष्ट मूर्तिकला, शिलालेख और प्रतीकात्मक अलंकरण का गहन अध्ययन किया।
यह शैक्षणिक भ्रमण प्रतिभागियों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ। इससे उन्होंने प्राकृत भाषा और जैन परंपरा के ऐतिहासिक-सांस्कृतिक संदर्भ समझे, भारतीय संस्कृति, धर्म, पुरातत्व और स्थापत्य कला का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया और कक्षा में प्राप्त सैद्धान्तिक अध्ययन को स्थलीय और अनुभवात्मक ज्ञान के माध्यम से समेकित किया। भ्रमण ने न केवल कार्यशाला के उद्देश्यों की पूर्ति की, बल्कि प्रतिभागियों के बौद्धिक, सांस्कृतिक और भाषिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।













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