जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं कल्याणक 15 दिसंबर को पौष कृष्ण एकादशी को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म एवं कल्याणक 15 दिसंबर को पौष कृष्ण एकादशी को मनाया जाएगा। भगवान पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। जैन ग्रंथों के अनुसार वर्तमान में काल चक्र का अवरोही भाग, अवसर्पिणी गतिशील है और इसके चौथे युग में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणासी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय राजा और उनकी रानी वामा के यहां पौष कृष्ण एकादशी के दिन महा तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। इनके शरीर पर सर्पचिह्म था। वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था, इसलिए पुत्र का नाम पार्श्व रखा गया। उनका प्रारंभिक जीवन राजकुमार के रूप में व्यतीत हुआ। एक दिन पार्श्व ने अपने महल से देखा कि पुरवासी पूजा की सामग्री लिए एक ओर जा रहे हैं। वहां जाकर उन्होंने देखा कि एक तपस्वी जहां पंचाग्नि जला रहा है और अग्नि में एक सर्प का जोड़ा मर रहा है, तब पार्श्व ने कहा कि ‘दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं’। तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने 30 वर्ष की आयु में घर त्याग दिया था और जैन दीक्षा ली। काशी में 83 दिन की कठोर तपस्या करने के बाद 84वें दिन उन्हें केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था। पुंड़्र, ताम्रलिप्त आदि अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया। ताम्रलिप्त में उनके शिष्य हुए। पार्श्वनाथ ने चतुर्विध संघ की स्थापना की।
इसमें श्रमण, श्रमणी, श्रावक, श्राविका होते हैं और आज भी जैन समाज इसी स्वरुप में है। प्रत्येक गण एक गणधर के तहत कार्य करता था। सभी अनुयायियों, स्त्री हो या पुरुष सभी को समान माना जाता था। सारनाथ जैन-आगम ग्रंथों में सिंहपुर के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं पर जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी ने जन्म लिया था और अपने अहिंसा धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। केवल ज्ञान के बाद तीर्थंकर पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के चार मुख्य व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह की शिक्षा दी थी।













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