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‘भक्तों के भगवान’ ’जयंतसेन सूरीजी महान’: 90वें जन्मोत्सव पर काव्यात्मक गुणानुवाद


आचार्यश्री जयंतसुरी जी के 90वां जन्मोत्सव पर काव्यात्मक भक्ति से उनका गुणानुवाद किया जा रहा है। पढ़िए, अर्चना जैन की कलम से…यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति


’90वां जन्मोत्सव’ 90गुणों से अलंकृत’

श्रद्धा उमंग से, भक्ति तरंग से,

गूंजे जग में आज वंदन।

पुण्य सम्राट के चरणों में,

शत-शत कोटि अभिनंदन।।

 

माटी पेपराल की पुण्य पावन,

जिसमें जन्मे अमृत पुरुष महान।

संयम का सूरज, त्याग का चंदन,

जग में फैला जिनवाणी,

का ज्ञान का गान।

 

बाल्य में जागा वैराग्य अद्भुत,

घर छोड़ा, जग रौशन किया।

संयम की सरिता बहा दी गुरु ने,

अंधकार को आलोक दिया।

 

कविरत्न, चिंतक, गीतकार,

भाष्यकार, ओजस्वी वक्ता।

इतिहासकार, सम्पादक कुशल,

जिन-वाणी के जग दीपक दाता।

 

श्रुत ज्ञान के अनुवादक अद्भुत,

विचारों में वाग्देवी वास।

वाणी में मधुर रस संचारित,

हर शब्द बना उपदेश विलास।

 

अनुशासनप्रिय, क्षमा करुणामय,

मार्गदर्शक, समाज सुधारक।

संघ संयोजक, नीति प्रवर्तक,

धर्म ध्वज के उच्च प्रचारक।

 

सौम्य सरल स्नेह समुंदर,

मन निर्मल जैसे गगन।

गुरु तुम साक्षात सत्य प्रतिमा,

तुमसे झलके जिन शासन।

 

 

तीर्थाेद्धारक, तीर्थ निर्माता,

संघ संरक्षक, संयम के धनी।

शासन दीपक, धर्म प्रहरी,

करुणा रस के सुधामणि।

 

उग्रविहारी, नवकार आराधक,

मधुकर प्यारे,शासन शिरोमणि,

वचन-सिद्ध, दृढ़संकल्पी,

विवेक-विभूषित महामणि।।

 

सहजता की मूर्ति साकार,

मधुरता का झरना अनंत।

तुम हो अमृत पुरुष, लोकसंत,

राष्ट्र संत, धर्मदृष्टि प्रखर प्रचंड।

 

स्नेहसिंधु, नीति-निधि,

संस्कार-सेतु, संयम-दीप।

गुरुवर! तुमसे जग आलोकित,

तुमसे जीवन बना सदीप।

 

तपस्वी, ध्यानरत, समाधिस्थ,

श्रुतज्ञ, परोपकारी वीर।

आत्मज्योति के आलोक से,

भवसागर के तारण अधीर।

 

अन्तर्दृष्टि सम्पन्न, चारित्रवान,

जाग्रत पुरुष, दृढ़निश्चयी।

सत्यव्रती, हितचिंतक दाता,

अमित करुणा से ओतप्रोत हुयी।।

 

धैर्य, संयम, समता, शुचिता,

साधना, सेवा, सहिष्णुता।

श्रद्धा, स्नेह, सत्व, सरलता,

गुरु के नव्वे गुणों की अमर पताका।।

 

प्रेरणा के तुम शिखर महान,

विनय, विवेक, वाणी सुवास।

विचार आपके जिनवाणी बनें,

हर हृदय में फैला प्रकाश।।

 

आत्मतत्व के आचार्य अद्वितीय,

अभिधर्मी, तत्त्ववेत्ता।

संघ-एकता के शिल्पी श्रेष्ठ,

जैन शासन के यश-गाथाकर्ता।।

 

तुम्हारे विचारों की छाया में,

शिष्य-संघ बने परिपूर्ण।

ज्ञान-सुगंध से महके जग,

भव मिटे, मिले सुरूर।।

 

संयम के शिखर, शांति के सागर,

समरसता के सृजनहार।

वाणी जिनकी वज्र समान,

मन जिनका कमल समान।

 

पर्वत जैसे अटल अडिग,

सागर जैसे गहरे विचार।

चंद्र समान शीतल स्नेही,

सूर्य समान तेज अपार।

 

विनयवान, कर्मठ, सज्जन,

भक्ति के अविरल स्रोत।

शासन शिरोमणि जयन्तसूरि,

तुम हो श्रद्धा के आदिप्रेरक सोत्र।

 

तुमसे ही परिषद उपवन खिला,

तुमसे ही मन हुआ प्रसन्न।

तुम्हारे ही आशीष से जगी,

संघ में मंगल की किरण।

 

ज्ञान, करुणा, दया, तप, त्याग,

श्रुत, शक्ति, शील, समभाव।

ये नव्वे गुण तुम्हारे दीप्त,

करें हृदय में सदा प्रभाव।

 

’अंतिम वंदना,,,,,’

 

विनत वाणी से कहती अर्चना,

“गुरुवर तुम सच्चे शिव स्वरूप।

तुमसे ही प्रकट हुई जीवन ज्योति,

तुमसे ही मिलता मोक्ष स्वरूप।

 

जय जय लोकसंत , पुण्य वाणी से

कीर्ति अमर रहे सारे संसार में।

नव्वे गुणों की यह सुवास

रहे शाश्वत-रहे अपार।।

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