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56वें अवतरण दिवस पर विशेष : छिंदवाड़ा की बालिका ‘गुड़िया’ से लेकर जैन समाज की प्रेरणास्त्रोत गणिनी आर्यिका बनने तक का प्रेरक जीवनपथ


आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी का जीवन संयम, सेवा और साहित्य साधना का अद्भुत संगम है। 1 नवम्बर 1969 को छिंदवाड़ा (सिवनी) में जन्मी संगीता जैन ने बाल्यकाल से ही धर्ममार्ग अपनाया और 1996 में आचार्य विद्याभूषण सन्मति सागर जी से आर्यिका दीक्षा ली। उन्होंने 121 बार सम्मेद शिखर जी की वंदना कर अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। माताजी ने सौ से अधिक धार्मिक ग्रंथों की रचना की, ‘शुभकामना परिवार’ की स्थापना की और हजारों युवाओं व कैदियों को प्रवचनों से जीवन परिवर्तन की प्रेरणा दी। उनकी प्रेरणा से बने जहाज आकार के स्वस्तिधाम मंदिर को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में स्थान मिला। उनके 56वें अवतरण दिवस पर पढ़िए मनोज जैन नायक का विशेष आलेख….


मुरैना। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा (सिवनी) में 1 नवम्बर 1969 को दिगंबर जैन परिवार के श्रावक श्रेष्ठी श्री मोतीलाल जैन एवं श्रीमती पुष्पा देवी जैन के घर एक तेजस्वी बालिका का जन्म हुआ। नाम रखा गया संगीता। यह बालिका इतनी प्यारी, चंचल और सुंदर थी कि सभी उसे स्नेह से गुड़िया कहने लगे।

बालिका गुड़िया को संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा परिवार से ही मिली। उनके पिता क्षुल्लक श्री परिणामसागर और माता क्षुल्लिका अर्हतमत्ती माताजी वर्तमान में साधनारत हैं। कहा गया है – ‘पोत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं।’ संगीता ने बाल्यकाल से ही देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा रखते हुए प्रतिदिन देव दर्शन और पूजा-पाठ करना अपनी दिनचर्या बना लिया।

धर्म के प्रति लगाव और जैन साधु-साध्वियों की सेवा में संलग्नता ने उन्हें संयम-पथ पर अग्रसर कर दिया। पढ़ाई में कुशाग्र बालिका गुड़िया ने एम.ए. (संस्कृत) तक शिक्षा प्राप्त की तथा प्राकृत, संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं में विशेष योग्यता हासिल की। चार भाई-बहनों में दूसरे स्थान पर रही संगीता ने लौकिक शिक्षा के उपरांत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया।

बाद में आचार्य विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज के संघ में ब्रह्मचारिणी बहन के रूप में रहकर संयम-साधना और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। तत्पश्चात 24 जनवरी 1996 को कटनी (मध्यप्रदेश) में आचार्य विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर उनका नामकरण हुआ – आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी।

माताजी ने शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर जी की लगातार 121 बार वंदना कर एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।

साहित्य सृजन

माताजी ने विधान संग्रह, काव्य संग्रह, विधान पूजन संग्रह और गद्य संग्रह सहित शताधिक विशेष कृतियों की रचना की है। उनकी महत्वपूर्ण कृति ‘जिनपद पूजांजलि’ में समस्त जैन पूजा, पाठ, विधान, आरती, चालीसा और स्तोत्रों का सरल भाषा में अनुवाद किया गया है।

‘शुभकामना परिवार’ की स्थापना

1 जनवरी 2009 को दिल्ली स्थित बिहारी कॉलोनी से माताजी ने ‘शुभकामना परिवार’ की स्थापना की। आज इसके भारतभर में 500 से अधिक शाखाएँ संचालित हैं। विशेष बात यह है कि नेपाल में भी इसका गठन हो चुका है।

प्रवचन विशेष

कोटा (राजस्थान) में माताजी ने एक साथ 44 हजार मेडिकल और इंजीनियरिंग छात्रों को उद्बोधन दिया। भारत की विभिन्न जेलों में उन्होंने अब तक 2500 से अधिक कैदियों को जीवन-परिवर्तनकारी प्रवचन दिए हैं। उनके ओजस्वी वचनों से डिप्रेशन के मरीजों ने भी स्वयं को बेहतर महसूस किया।

संस्कार शिविर प्रेरणा

माताजी अब तक बाल साधना संस्कार शिविर, ज्ञान ध्यान शिविर और ध्यान योग शिविर जैसे सैकड़ों शिविरों की प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं, जिनके माध्यम से असंख्य जीवनों में आध्यात्मिक संस्कार अंकुरित हुए।

कृत्रिम तीर्थ रचनाएँ

माताजी ने भारत के विभिन्न नगरों में धर्म-प्रभावना हेतु श्री समवशरण, श्री सम्मेद शिखर जी, श्री कैलास पर्वत और श्री पावापुरी जी की प्रतिकृतियाँ बनवाकर कृत्रिम तीर्थों की स्थापना करवाई है।

युवा प्रतिभा और प्रेरणा

माताजी ने देश की युवा प्रतिभाओं के सम्मान हेतु युवा प्रतिभा सम्मान समारोह और युवा सम्मेलन की परंपरा शुरू की। 13 मार्च 2021 को स्वस्तिधाम में आयोजित युवा सेमिनार में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मोटिवेशनल स्पीकर डॉ. उज्ज्वल पाटनी ने सहभागिता की, जिसमें देशभर से 3500 से अधिक युवा उपस्थित रहे।

विभिन्न उपाधियाँ एवं सम्मान

माताजी को परम विदुषी लेखिका, काव्य रत्नाकर, भारत गौरव, युगप्रवर्तिका जैसी अनेक उपाधियाँ प्राप्त हुईं। 22 फरवरी 2020 को स्वस्तिधाम में आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज (छाणी परंपरा के षष्ट पट्टाधीश) द्वारा उन्हें गणिनी पद से विभूषित किया गया।

धर्मप्रेरणा एवं निर्माण कार्य

माताजी ने अब तक अनेक मंदिरों के जीर्णोद्धार और नवीन निर्माण की प्रेरणा दी है। उनकी प्रेरणा से श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र स्वस्तिधाम, जहाजपुर (राजस्थान) में भूगर्भ से प्रकटित चिंतामणि विघ्नहरण सर्वारिष्टनिवारक भगवान की प्रतिमा विराजमान की गई।

विश्व के सबसे बड़े जहाज के आकार में बने इस जहाज मंदिर को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। 31 जनवरी से 7 फरवरी 2020 तक यहां हुए पंचकल्याणक महोत्सव में एक दिन में सर्वाधिक प्रतिमाओं को सूर्य मंत्र देकर प्राण प्रतिष्ठा की गई, जो गोल्डन बुक में दर्ज हुआ।

इस ऐतिहासिक आयोजन में देशभर से लाखों श्रद्धालु सम्मिलित हुए — एक दिन में लगभग 5 लाख और पूरे आयोजन में 15 लाख से अधिक लोगों ने सहभागिता की।

माताजी का जीवन संदेश

माताजी अपने जीवन का एक भी क्षण व्यर्थ नहीं जाने देतीं। वे स्वयं धर्ममार्ग पर चलकर असंख्य जनों को नियमित मंदिर-भक्ति और साधना के लिए प्रेरित करती हैं।

उनका अमृत वचन —

जो मिला किसी से कम नहीं, जो नहीं मिला उसका गम नहीं।

यह वचन अनगिनत जीवनों में सकारात्मक परिवर्तन का कारण बना है।

1 से 6 फरवरी 2023 तक श्री आदिनाथ दिगंबर जैन ज्ञानतीर्थ क्षेत्र, मुरैना (म.प्र.) में उनके निर्देशन में ऐतिहासिक श्री आदिनाथ जिनबिंब मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक महोत्सव संपन्न हुआ।

56वें अवतरण दिवस पर स्वस्तिधाम प्रणेत्री, विदुषी लेखिका, भारत गौरव, गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी के चरणों में शत-शत नमन।

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