अशोकनगर में आयोजित विशाल धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनि पुगंव श्री सुधासागर जी महाराज ने रसना इन्द्रि पर संयम, आत्मा की शुद्धि और त्याग की महिमा पर गहन प्रवचन दिया। वहीं विजय धुर्रा ने बताया कि पंच कल्याणक महोत्सव में इन्द्र-इन्द्राणी बनने के लिए फॉर्म वितरण शुरू हो गया है और कल भगवान के माता-पिता का चयन किया जाएगा। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
अशोकनगर। राष्ट्रसंत मुनि पुगंव श्री सुधासागर जी महाराज ने सुभाषगंज मैदान में आयोजित विशाल धर्मसभा में कहा कि रसना इन्द्रि पर विजय वही पा सकता है जिसके सामने भोजन रखा हो और वह न खाए। यह त्याग ही सबसे बड़ी साधना है। साधु के जीवन में यह तप निरंतर चलता है। साधु सब कुछ ले सकता है, पर वह कहता है—‘मैं नहीं लूंगा’, यही सर्वोच्च अनुशासन है।
महाराज ने उदाहरण देकर कहा कि चक्रवर्ती दश लक्षण पर्व के दस दिनों के उपवास से देवता भी प्रभावित होते हैं। ऐसे उपवासियों को देखकर देवता स्वयं दर्शन करने आते हैं। उन्होंने बताया कि सुदर्शन सेठ जैसे धनवान व्यक्ति भी जंगल में जाकर सामायिक करते हैं—यह सच्चे त्याग का प्रतीक है।
पंच कल्याणक महोत्सव में हर घर से बनेगा एक इन्द्र-इन्द्राणी जोड़ा
जैन समाज मंत्री विजय धुर्रा ने बताया कि परम पूज्य मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराजसंघ व प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भइया के निर्देशन में 9 से 15 दिसंबर तक श्री मद् जिनेन्द्र पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव, विश्व शांति महायज्ञ और गजरथ महोत्सव का भव्य आयोजन होगा।
उन्होंने कहा कि इस शाही आयोजन में हर घर से एक इन्द्र-इन्द्राणी जोड़ा बनने का सौभाग्य मिलेगा। समिति द्वारा वस्त्र, आभूषण, हार, मुकुट और शुद्ध भोजन की व्यवस्था की जाएगी ताकि सभी भक्त निश्चिंत होकर भक्ति कर सकें।
कल धनतेरस पर चुने जाएंगे भगवान के माता-पिता
विजय धुर्रा ने बताया कि कल धनतेरस को पंच कल्याणक महोत्सव के प्रमुख पात्रों में भगवान के माता-पिता का चयन किया जाएगा। पात्रता फॉर्म पंचायत कमेटी के कार्यालय से प्राप्त किए जा सकते हैं।
समाज के अध्यक्ष राकेश कासंल, महामंत्री राकेश अमरोद, कोषाध्यक्ष सुनील अखाई, उपाध्यक्ष अजित बरोदिया, प्रदीप तारई, राजेन्द्र अमन, मंत्री शैलेन्द्र श्रागर, मंत्री संजीव भारल्लिया, मीडिया प्रभारी अरविंद कचनार, ऑडिटर संजय केटी, थूवोनजी अध्यक्ष अशोक जैन टींगू मिल महामंत्री मनोज भैसरवास सहित अन्य पदाधिकारियों ने समाजजनों से अनुरोध किया कि वे शीघ्र नाम दर्ज कर महोत्सव की शोभा बढ़ाएं।
रोटी का स्वाद पाने के लिए गेहूं को पीसना आवश्यक — मुनि श्री
मुनि सुधासागरजी ने जैन दर्शन के संदर्भ में कहा कि आत्मा का अनुभव त्याग और शुद्ध निश्चय नय से ही संभव है। जैसे गेहूं को सीधे खाकर रोटी का स्वाद नहीं मिल सकता, वैसे ही आत्मा का सुख बिना तप और शुद्धिकरण के संभव नहीं। उन्होंने कहा — “जिन्हें आत्मा की शुद्धि का अनुभव नहीं है, वे केवल ज्ञान के भ्रम में हैं।”
त्याग ही आत्मा के आनंद का मार्ग
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति यह मान लेता है कि उसकी आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है और वह केवल इस विचार से ही आनंद लेने लगता है, तो वही सबसे बड़ी भूल है। आत्मा के आनंद के लिए कर्म, तप और संयम आवश्यक हैं।
मुनि श्री ने कहा कि जीवन में कभी ऐसा कार्य न करें जिससे माता-पिता को पीड़ा पहुंचे। “यदि तुम्हारे लिए माता-पिता को पीटना पड़े तो यह सबसे बड़ा पाप होगा। जीवन में ऐसा कोई कार्य मत करना कि तुम्हारे माता-पिता को तुम्हारे लिए कष्ट झेलना पड़े — यही जीवन का वास्तविक नियम है,” उन्होंने कहा।
समाज में उत्साह, धर्मसभा में उमड़ा जनसागर
धर्मसभा में सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। पूरा वातावरण भक्ति, त्याग और संयम की भावना से ओतप्रोत रहा। सभा के अंत में आयोजकों ने सभी से पंच कल्याणक महोत्सव में भाग लेने और धर्म की इस भव्य परंपरा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।













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