गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। उन्हीं के संघस्थ ब्रह्मचारी प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन जी ने उत्तम त्याग धर्म के बारे में बताया। अयोध्या से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटिल की यह खबर…
अयोध्या। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। उन्हीं के संघस्थ ब्रह्मचारी प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन जी ने उत्तम त्याग धर्म के बारे में बताया।
उन्होंने कहा कि उत्तम त्याग कह्यो जग सारा, औषधि शास्त्र अभय आहारा।
निहचौ राग-द्वेष निरवारै, ज्ञाता दोनों दान संभारै।
त्याग से सुख की प्राप्ति होती है। त्यागी व्यक्ति सदैव ही चिंता मुक्त रहता है। उसे किसी भी प्रकार की चिंता मन में नहीं रहती है। त्याग धर्म का अंग है। तप गुण से युक्त अत्यंत पवित्र पात्र के लिए अपनी शक्ति के अनुसार भक्तिपूर्वक त्याग देना चाहिए क्योंकि, वह पात्र अन्य गति के लिए पाथेय के समान है। ऐसा समझो। दान चार प्रकार के शास्त्रों में बतलाया है। अभय दान, शास्त्र दान, औषधि दान एवं आहार दान। सभी दान श्रेष्ठ हैं लेकिन, उत्तम पात्र को दिया हुआ आहार दान श्रेष्ठ है चूंकि, वह श्रेष्ठ गति का बंध कराता है। दिगंबर साधु को उत्तम पात्र की संज्ञा दी है, जो सदैव ज्ञान ध्यान और साधना में रत रहते हैं। उनको दिया हुआ आहार दान श्रेष्ठ गति का बंध कराता है। हर व्यक्ति को सदैव यथा शक्ति दान करना चाहिए।
उत्तम त्याग कहा जग में, जो त्यागे विषय कषायों को।
शुभ दान चार विध के देवें, उत्तम आदि त्रय पात्रों को।













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