नैनवा (बूंदी) में वर्षायोग कर रहे मुनि 108 प्रज्ञान सागर जी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि संसार को सुधारने से पहले स्वयं को सुधारना जरूरी है। दृष्टि बदलने से सृष्टि बदल जाएगी। उन्होंने ‘मेरी भावना’ को शिक्षण संस्थानों में शामिल करने की भी अपील की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
नैनवा (बूंदी)। परमपूज्य आचार्य 108 विनिश्चय सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री 108 प्रज्ञान सागर जी महाराज एवं मुनि प्रसिद्ध सागर जी महाराज, बूंदी जिले के नैनवा नगर में वर्षायोग कर रहे हैं। यहाँ की पावन वसुंधरा ‘छोटी काशी’ के नाम से प्रसिद्ध है और वर्तमान में धर्मप्रभावना का केंद्र बनी हुई है। मंदिर एवं वर्षायोग समिति ने राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” (कोटा) और खंडेलवाल सरावगी समाज के पूर्व अध्यक्ष रविंद्र जी काला (बूंदी) का पगड़ी, माला, दुपट्टा और स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया। इस अवसर पर पारस जैन द्वारा रचित “मेरी भावना” आलेख, जो विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हुआ है, मुनि श्री को भेंट किया गया। मुनि श्री ने इसे शिक्षण संस्थानों में पाठ्यक्रम व प्रार्थना के रूप में शामिल करने की आवश्यकता बताई।
संसार एक प्रतिबिंब है, जो दोगे वही लौटेगा
शांति वीर धर्मशाला में आयोजित विशाल धर्मसभा में मुनि प्रज्ञान सागर जी ने कहा — “संसार एक प्रतिबिंब है, जो दोगे वही लौटेगा। भव सुधारने के लिए भाव सुधारना अनिवार्य है। दृष्टि जैसी होगी, वैसी सृष्टि दिखाई देगी, इसलिए दृष्टि बदलने की आवश्यकता है, सृष्टि बदलने की नहीं।” उन्होंने भगवान महावीर का संदेश दोहराते हुए कहा — “स्वयं सुधरो, संसार स्वयं सुधर जाएगा। धर्मसभा में मुनि प्रसिद्ध सागर जी ने भी अपने विचार रखे। इस अवसर पर नगर के अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।













Add Comment