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दुःख जीवन में मात्र ‘मै’ और मेरे पन में है : मुनिश्री जयंत सागर जी ने दुःख के निवारण के उपाय बताए


स्थानीय भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में गुरुवार को मुनिश्री जयंतसागर जी महाराज के प्रवचन हुए। इसमें मुनिश्री ने कर्मों की निर्जरा पर जोर दिया। वर्षायोग चातुर्मास में मंदिर परिसर में प्रतिदिन प्रवचन का बड़ी संख्या में दिगंबर जैन समाज बंधु लाभ ले रहे हैं। नांद्रे से पढ़िए, यह खबर…


नांद्रे। स्थानीय भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में गुरुवार को मुनिश्री जयंतसागर जी महाराज के प्रवचन हुए। इसमें मुनिश्री ने कर्मों की निर्जरा पर जोर दिया। वर्षायोग चातुर्मास में मंदिर परिसर में प्रतिदिन प्रवचन का बड़ी संख्या में दिगंबर जैन समाज बंधु लाभ ले रहे हैं। अभिषेक अशोक पाटिल कोल्हापुर ने कहा कि पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनिश्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लकश्री श्रुतसागरजी महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में पावन वर्षायोग चातुर्मास कर रहे हैं। प्रवचन में मुनि श्री जयंत सागरजी महाराज ने कि मित्रो! जीवन में दुःख कहां है। इसका विचार किसी ने आज तक नहीं किया। दुःख जीवन में मात्र ‘मै’ और मेरे पन में है। जहां ममत्व भाव आता है, जहां अपने पर से अपेक्षा करना प्रारंभ कर दिया वहां दुःख होना कर्माें का आश्रव होना प्रारंभ हो जाता है और व्यक्ति स्वयं ही प्रकट करता है पर से इतना अपेक्षा( इच्छा) कर बैठता है कि जब सामने वाला आपकी इच्छा की पूर्ति नहीं करता, आपकी इच्छा की उपेक्षा कर देता है तो हमें दुःख होना प्रारंभ हो जाता है।

हमने स्वयं अपने दुःख को उत्पन्न किया है और हम ममत्व बुद्धि अपनापन रखे ही नहीं। पर से तो हमें दुःख नहीं होगा और जीवन आनंदमय बीतना प्रारंभ होना चालू हो जाएगा क्योंकि, अज्ञानी व्यक्ति ये सोच कर संसार में फंसा हुआ है कि मैं नहीं रहूंगा तो घर नहीं चल जाएगा। कोई रह नहीं पाएंगे। अरे भाई ! ये हमारी अज्ञानता है। आप नहीं रहोगे तो भी घर चलेगा और रहोगे तब भी घर चल रहा है। इसलिए दुःख को समाप्त करना है तो ममत्व भाव नष्ट कर दो।

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