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आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के वचन सब कुछ करना मगर शंका मत करना : रामगंजमंडी में धर्म प्रभावना का स्तर बहुत उच्च है 


आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज नगर में विराजित हैं। उनका पावन वर्षायोग यहां जारी है। नगर में आचायश्री की मंगल देशना से कई दिगंबर जैन समाज के परिवार पुण्यार्जन कर रहे हैं। धर्म प्रभावना का स्तर बहुत उच्च है। लोगों को धर्म, शास्त्र आदि का ज्ञान मिल रहा है। सोमवार को आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा की सब कुछ कर लेना मगर शंका मत करना। किसी के प्रति शंका है तो कह दो तुरंत स्पष्ट बात कर लो। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज नगर में विराजित हैं। उनका पावन वर्षायोग यहां जारी है। नगर में आचायश्री की मंगल देशना से कई दिगंबर जैन समाज के परिवार पुण्यार्जन कर रहे हैं। धर्म प्रभावना का स्तर बहुत उच्च है। लोगों को धर्म, शास्त्र आदि का ज्ञान मिल रहा है। सोमवार को आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा की सब कुछ कर लेना मगर शंका मत करना। किसी के प्रति शंका है तो कह दो तुरंत स्पष्ट बात कर लो। मुझे ऐसा लग रहा आप ऐसे हैं यदि वो कह दे मैं ऐसा नहीं हूं तो मान लो क्यों अपना दिमाग खराब करते हो। हम स्वीकार नहीं कर पाते, कहते है कि तुम झूठ बोल रहे हो। दिमाग में फितूर आ जाता है कि व्यक्ति झूठ बोल रहा है। ऐसा करते-करते कई परिवार बिगड़ते चले गए बिगड़ते चले गए और आश्चर्य तब होने लगता है 18 वर्ष के बच्चे हमारे पास आकर कहते हैं कि महाराज श्री पापा मम्मी को समझाओ कि वह शंका न करें। कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा यह कोई अच्छी बात नहीं।

18 साल का बच्चा जिसकी शादी की आप तैयारी कर रहे हैं 25 साल का बच्चा जिसका आप बायोडाटा निकाल रहे हैं। उसके सामने दोनों लड़ रहे हैं यह केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि, आपस में दोनों में विश्वास नहीं है। जब बच्चा झूले में झूल रहा था तब तक लड़ाई ठीक है। अब बच्चा झूले में नहीं है अब बच्चा सब समझता है। कम से कम इतनी मर्यादा तो बना लो अपने बच्चों के सामने मत लड़ो। अगर मां बाप आपस में लड़ेंगे तो बच्चे भी शादी होने के बाद आपस में लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि आप गृहस्थ जीवन में हो तो उसका भी आनंद उठाओ ऐसा नहीं है कि गृहस्थ जीवन में आनंद नहीं है। गृहस्थ जीवन बड़ा विचित्र है व्यक्ति अर्थ ,सामाजिकता का अभाव होने पर भी आनंद उठा लेता है। हमारी आस्था क्या है हमारी कल्पना क्या है उसी हिसाब से सुकून मिलता है जिंदगी की कीमत होती है मुर्दे की नहीं।

इंसान के पास सब कुछ है लेकिन सुकुन नहीं है। सब कुछ तुम्हारे पास है लेकिन सुकुन तुम्हे अपने पुरुषार्थ से ही पाना होगा। अगर तुम्हारा पुरुषार्थ सही जगह होगा तो सुकुन अनुभव जरूर होगा। घर मकान एवम घर में साम्रगी सबके पास भरपूर है लेकिन सुकुन नहीं है। अच्छा खाना अच्छा भोजन अच्छा आवास होने के बावजूद आपके पास सुकुन नहीं हैं तो आपसे गया बीता कोन है। यह आपकी कमी है। अमृत जिव्हा पर है फ़िर भी आप स्वाद नहीं ले पा रहे हैं। लेकिन हम एहसास नहीं करते अगर एहसास करें तो सुकुन जरूर मिलेगा। विकल्पों में साधनों की असंतुष्टि में जिओगे तो सुकुन कभी मिलने वाला नहीं है।

संसारी जीव की समस्या का समाधान उसी के पास 

आचार्य श्री ने कहा सारे जीवन में असंख्यात समस्या आने वाली है जिसके पास पहुंचेंगे। किस किस का समाधान किस-किस के पास जाकर खोजोगे। जिसके पास भी जाओगे क्या वह तुम्हारी समस्या का समाधान कर देगा नहीं कर सकता। आचार्य श्री ने हिरण का उदाहरण देते हुए कहा कि हिरण की नाभि में कस्तूरी होती है लेकिन वह रेगिस्तान में जंगल में खोजती है कि सुगंध कहां से आ रही है इधर-उधर ढूंढती है थक जाती है, और हार कर प्राण खो देती है। इतनी सी बात समझ नहीं पाती कि यह सुगंध मेरी नाभि में से आ रही है। यही बात संसारी जीव को भी समझ में नहीं आ रही है कि मेरी समस्या का समाधान मैं ही हूं। कोई दूसरा नहीं है। न कोई संत, न कोई महंत न कोई देवता, न कोई तंत्र, न कोई मंत्र सिर्फ मात्र जीव अपनी समस्या का समाधान कर सकता है।

या तो वो कर्म निर्जरा करके कर सकता है या फिर शुभ कर्मों को उदय में लाकर कर सकता है या फिर पाप कर्मों को पुण्य के संक्रमण में लाकर कर सकता है किसी के भी सामने झोली फैला ली। इससे कुछ नहीं होगा और कर्म बंधते जाएंगे। समस्या का अंबार लगा देगे लेकिन, उस मृग के समान समाधान हमारे पास होते हुए भी हम समाधान को बाहर खोज रहे हैं। अपने भावों को शुद्ध बनाएंगे विशुद्धि को बढ़ाएंगे पुण्य होगा सब काम अपने आप होंगे।

 सभी के प्रति समान दृष्टि रखना अनुकंपा है

आचार्य श्री ने अनुकंपा के विषय पर भी प्रकाश डाला और कहा कि सब जीवो पर समान दृष्टि रखना परिवार का सदस्य हो पड़ोसी हो देश-विदेश में हो सब पर समान दृष्टि रखना कोई भेद नहीं होना अपना पराया नहीं होता। इसे अनुकंपा कहा जाता है। अनुकंपा स्वार्थ अनुकंपा नहीं होना चाहिए। जहां हमें आवश्यक है वहां अनुकंपा दिखाएं जहां नहीं हैं वहां नहीं दिखाएं। समान रूप से अनुकंपा होनी चाहिए। हमारे द्वारा किसी जीव को कष्ट पीड़ा ना हो यह भाव होना चाहिए। अपने आप पर भी और दूसरे पर भी अनुकंपा करें। उन्होंने कहा जहां पर भाव होता है वहीं सच्ची आस्था होती है। जहां पर भाव नहीं होता वहां आस्था नहीं होती। भाव की जरूरत है, भाव होगा तो आस्तिक गुण प्रकट होगा जैसा विश्वास बाहर की चीजों पर है वैसा विश्वास देव शास्त्र गुरु पर करें।

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