जैन धर्म के सभी तीर्थंकरों के पंच कल्याणकों को लेकर दिगंबर जैन समाज में विशेष धार्मिक आस्था और श्रद्धा रहती है। तीर्थंकर भगवानों के कल्याणकों पर मंदिरों में विशेष पूजन, विधान, धार्मिक कार्यक्रम और महायज्ञादि किए जाते हैं। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक इस बार 31 जुलाई को आ रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के सभी तीर्थंकरों के पंच कल्याणकों को लेकर दिगंबर जैन समाज में विशेष धार्मिक आस्था और श्रद्धा रहती है। तीर्थंकर भगवानों के कल्याणकों पर मंदिरों में विशेष पूजन, विधान, धार्मिक कार्यक्रम और महायज्ञादि किए जाते हैं। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक इस बार 31 जुलाई को आ रहा है। तिथि के अनुसार यह श्रावण शुक्ल सप्तमी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान पारसनाथ ने सम्मेदशिखर पर जाकर निर्वाण को प्राप्त किया था। इस दिन जैन धर्मावलंबी भगवान पार्श्वनाथ की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और निर्वाण लाडू चढ़ाते हैं। मोक्ष कल्याणक के बारे में उल्लेखनीय है कि जैन धर्म और ग्रंथों में मोक्ष का अर्थ है जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति। इस असार संसार से सारे कर्मों को नष्ट कर मोक्ष पाना। भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष कल्याणक की यह तिथि श्रावण शुक्ल सप्तमी भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष दिवस के रूप में मनाई जाती है। इसे मोक्ष सप्तमी के रूप में भी ख्याति अर्जित है। तीर्थराज सम्मेद शिखरजी के बारे में मान्यता है कि भगवान पार्श्वनाथ ने यहीं से मोक्ष प्राप्त किया था। इस अवसर पर जैन मंदिरों में भगवान पार्श्वनाथ की विशेष पूजा-अर्चना के बाद निर्वाण लाडू चढ़ाने की प्रथा है। जैन धर्मावलंबी भगवान पार्श्वनाथ की पूजा-अर्चना, शांतिधारा और अन्य धार्मिक क्रियाएं भी करते हैं। भगवान पार्श्वनाथ जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर हैं और उनका जन्म उनका जन्म वाराणसी में राजा अश्वसेन और रानी वामा के घर हुआ था।
सभी को चैतन्य प्रभु से रिश्ता जोड़ना चाहिए
भगवान पार्श्वनाथ के मोक्ष कल्याणक पर सम्मेदशिखर जी क्षेत्र की पूजा और निर्वाण कांड का पाठ करने के बाद निर्वाण लाडू चढ़ाने का विधान है। संतों की वाणाी के अनुसार जिस प्रकार यह लाडू रस भरी बूंदी से निर्मित किए जाते हैं। उसी प्रकार अंतरंग से आत्मा की प्र्रीति रस से भरी हो जाए तो परमात्मा बनने में देरी नहीं लगती। धार्मिक मान्यता के अनुसार जिनका मोक्ष हो जाता है। उनका मनुष्य भव में जन्म लेना सार्थक हो जाता है। जब तक संसार है तब तक चिंता रहती है, जहां मोक्ष का पूरी तरह क्षय हो जाता है वहीं मोक्ष हो जाता है। अतः हमें अपनी आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए मोह रूपी शत्रु का नाश करना पड़ता है। इसलिए सभी का सम्मान करना चाहिए। बड़ों के प्रति विनय भाव रखना चाहिए क्योंकि, विनय ही मोक्ष का द्वार है। मुनिराज और साधु-संतों की अमर वाणी है कि सभी को चैतन्य प्रभु से रिश्ता जोड़ना चाहिए क्योंकि, पुण्यात्मा जहां भी चरण रखते हैं। वहां से दुख, अंधकार, कषाय, क्लेश स्वमेव ही प्रकाश और सुखों में परिवर्तित हो जाते हैं। इस दिन खास तौर पर जैन समाज की बालिकाएं सामूहिक रूप् से निर्जला उपवास रखती हैं। दिनभर पूजन, स्वाध्याय, मनन, चिंतन, सामूहिक प्रतिक्रमण करते हुए संध्या के समय देव शास्त्र गुरु की सामूहिक भक्ति कर आत्म चिंतन करती हैं। शाम को उनको घोड़ी-बग्घी में बिठाकर घुमाया जाता है तथा अगले दिन उनका पारणा कराया जाता है। इस पर्व को मोक्ष सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। जिस तरह प्रभु का स्पर्श हो हमें स्वर्ण ही नहीं पारस बना देता है। उसी तरह हम भी भगवान पार्श्वनाथ की तरह आपने भवों को कम करके निर्वाण प्राप्ति की ओर बढ़ें और मोक्ष प्राप्त करें। यही सीख हमें लेना चाहिए।













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