समाचार

संपत्ति नहीं संतुष्टि का होना महत्वपूर्ण है: आचार्य श्री विनिश्चय सागर ने धर्मसभा में दी अनमोल सीख 


आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने सोमवार की प्रातः बेला में मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि संपत्ति का होना महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण संतुष्टि का होना है। उन्होंने कहा कि संपत्ति आपके पास है लेकिन, संतुष्टि हो यह जरूरी नहीं है। उन्होंने वर्तमान के मानव के स्वभाव को बताते हुए कहा कि आज का मानव यदि परेशान है तो संपत्ति शरीर परिवार से है और कोई चीज नहीं है, जिससे वह परेशान हो। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने सोमवार की प्रातः बेला में मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि संपत्ति का होना महत्वपूर्ण नहीं महत्वपूर्ण संतुष्टि का होना है। उन्होंने कहा कि संपत्ति आपके पास है लेकिन, संतुष्टि हो यह जरूरी नहीं है। उन्होंने वर्तमान के मानव के स्वभाव को बताते हुए कहा कि आज का मानव यदि परेशान है तो संपत्ति शरीर परिवार से है और कोई चीज नहीं है, जिससे वह परेशान हो। यह तीन चीज किसी भी व्यक्ति को परेशान कर सकती हैं। हमारा जैन धर्म कहता है कि कल का भी नहीं सोचना पल का भी भरोसा नहीं है। इंसान पीढ़ियों की महीनों की सालों की सोच रहा है। अच्छा काम जो करना है आज कर लो। अगर कल पर छोड़ दिया तो उत्साह घट जाता है। यदि यात्रा का भाव बना है तो कल पर नहीं टाल कर आज ही निकल जाना।

एक बार संतुष्ट होकर तो देखें सब विकल्प समाप्त होंगे

अपने आप को भरोसा दें अच्छे काम आज कर ले, बुरे काम को कल पर छोड़ दें यदि किसी प्रति गाली का भाव आए तो कल दूंगा आज नहीं जो चीज़ संपति आदि हमें मिली है, उसमें हम संतुष्ट नहीं है। यह हमें भाग्य उदय से मिली है संपत्ति में नहीं आनंद संतुष्टि में मिले यह प्रयास करना चाहिए। संपत्ति की जगह सुकून को जोड़ना चाहिए हम कर्म अधीन हैं इस पर हमारा हस्तक्षेप नहीं बन सकता लेकिन, हम नासमझ हैं। उन्होंने कहा एक बार संतुष्ट होकर देखो वह आनंद और शांति सुकून मिलेगा। एक बार संतुष्ट होकर तो देखें सब विकल्प समाप्त होंगे। जैन दर्शन में भावों को महत्व दिया है।

मन को भी टाइट करना चाहिए

महाराज श्री ने मानसिकता को ठीक करने पर जोर दिया हम शांतिनाथ भगवान के दर्शन कर रहे हैं और मानसिकता ठीक नहीं है तो कुछ भी नहीं होगा। हमें हमारी मानसिकता को ठीक करने पर ध्यान देना चाहिए। यदि मानसिकता सही है तो दुनिया में कहीं भी चले जाएं सही होगा। धर्म कर रहे हैं और धर्म के अंदर मानसिकता ठीक नहीं है तो धर्म ठीक नहीं कर पाएगा। मन को भी टाइट करना चाहिए मन को कंट्रोल करना चाहिए। मन को शुभ में लगाने के लिए डंडा चाहिए कंट्रोल चाहिए। आपने मन को खुली छूट दी है। मन जो मांगे वह नहीं देना है, जो उसने नहीं मांगा वह देना है। सावधान होकर मन के विरुद्ध चले मन के विरुद्ध चले तो उपलब्धि होगी। रामगंजमंडी की भगवन आत्माओं कहकर संबोधित करते हुए कहा कि यह मैं आपको शक्ति रूप से कह रहा हूं कि मन में गांठ बांधों हम हमेशा संतुष्ट रहें, जो नहीं हो पाया तो भी संतुष्ट रहें।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page