समाज की उन्नति और अग्रगामी होने के लिए साधर्मी संस्था का होना जरूरी है। मुरैना की तर्ज पर हर जगह इस तरह की संस्था हो। जो समाज का हित साधे और तीर्थ संरक्षण का बीड़ा उठाए। मुरैना से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह खबर…
कोटा। गो वत्स सम वात्सल्य जगाओ साधर्मी को गले लगाओ, आओ सब मिल एक जैन साधर्मी संस्था बनाओ। पूरे भारत की जैन समाज जो नहीं कर पाई मुरैना जैन समाज में कर दिखाया। मैंने एक भजन सुना था। इस जन्म न सही पर भव में मिलता है। अपनी अपनी करनी का फल सबको मिलता है। एक गीत दूसरों का दुखड़ा दूर करने वाले तेरे दुख दूर करेंगे राम, किसी की के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार किसी दर्द मिल सके तो ले उधार जीना इसी का नाम है। जी हां, संसार एक प्रतिक्रिया है जो दोगे वो मिलेगा। जैसी करनी वैसी भरनी। जी हां, पूरे भारत की जैन समाज जो नही कर पाई वो मुरैना जैन समाज के कुछ जैन परिवारों के युवाओं ने कर दिखाया। उन्होंने एक जैन सधर्मी विकास संस्था बनाई।
इस संस्था के माध्यम से जो जैन समाज के बच्चे बच्चियां आर्थिक रूप से कमजोर हैं। उनके लिए पढ़ाई के लिए पैसा देती है। जब बच्चे जॉब लग जाते है तो उस संस्था को पैसा वापस लौटा देते हैं। किसी भी परिवार को कोई भी आर्थिक मजबूरी में ये संस्था मदद करती है। भले ही शुरू में इस संस्था से कुछ लोग जुड़े थे परन्तु इस नेक कार्य का काफिला समय के साथ बढ़ता गया। आज वर्तमान समय में ये संस्था पूरे भारत की जैन समाज के लिए एक प्रेरणा बन चुकी है।
जैन साधर्मी विकास संस्था का होना समय की मांग
आज भारत की जनसंख्या 145 करोड़ के पार चली गई। सरकारी आंकड़ों के जैन समाज की संख्या मात्र 55 लाख के आस पास बताई जा रही है। वैसे यदि एक करोड़ भी मान ले तो भी हमारी संख्या नगण्य ही है। आने वाले सालों में ओर कम हो जाएगी। जैन समाज के विकास और निरंतर उन्नति के लिए हैं। समाज के बच्चों को उच्च से उच्च पढ़ाई के लिए, बेरोजगार युवाओं के रोजगार किए, विधवाओं के भरण पोषण के लिए, तीसरी संतान पर उनको सम्मानित करने के लिए भारत वर्ष के प्रत्येक नगर कस्बे में जैन साधर्मी विकास संस्था का होना समय की मांग है।
जब संतति नहीं रहेगी तो संस्कृति क्या बचेगी
हम नित नए मंदिर बनाते हैं बड़े-बड़े धार्मिक अनुष्ठानों आयोजनों में करोड़ों की राशि लगाते हैं। क्या जैन साधर्मी भाई बहनों की आर्थिक मदद ले लिए ‘साधर्मी विकास संस्था’ नहीं बना सकते। हम यदि बड़े रूप में इस ‘साधर्मी विकास संस्था’ को नहीं बना पाए तो छोटे रूप में भी बना सकते हैं। हमारी संख्या अगर नहीं बड़ी तो हमारी संस्कृति धर्म तीर्थ क्षेत्र सबके असुरक्षित होने का खतरा बना रहेगा। संतति से ही संस्कृति की रक्षा होती है, जब संतति नहीं रहेगी तो संस्कृति क्या बचेगी। शासन-प्रशासन उनका ही साथ देता है, जिनका वोट बैंक ज्यादा होता है।
समाजजन इस ओर ध्यान देंगे
अभी देख लीजिए गुजरात में स्थित गिरनार तीर्थ की स्थिति तीर्थराज समय शिखरजी में पारसनाथ पर्वत की स्थिति बहुत सोचनीय गंभीर आत्म चिंतनीय विषय है। मैं आशा करता और विश्वास रखता हूं कि इस ओर हमारे जितने भी प्रबुद्ध सधर्मी भाई बहन युवा पीढ़ी उद्योगपति पूंजीपति वर्ग इस ओर अतिशीध्र ध्यान दंेगे। यदि अभी नहीं जागे तो कभी नहीं जाग पाएंगे।













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