समाचार

मुनिश्री के सानिध्य में कविश जैन ने किया प्रथम बार अभिषेक: प्रतिदिन अभिषेक करने का संकल्प लिया 


मुनि श्री संयत सागरजी महाराज के सानिध्य में कविश जैन ने प्रथम बार श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की और यह दिवस सम्यकत्व लाभ दिवस के रूप मे मनाया गया। समस्त क्रियाओं को विधि विधान के साथ प्रशांत जैन आचार्य आकाश जैन आचार्य ने कराया। इस अवसर पर भक्ति भाव के साथ आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज का पूजन किया गया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर… 


 रामगंजमंडी। मुनि श्री संयत सागरजी महाराज के सानिध्य में कविश जैन ने प्रथम बार श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा की और यह दिवस सम्यकत्व लाभ दिवस के रूप मे मनाया गया। समस्त क्रियाओं को विधि विधान के साथ प्रशांत जैन आचार्य आकाश जैन आचार्य ने कराया। इस अवसर पर भक्ति भाव के साथ आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज का पूजन किया गया। महावीर अनिता जैन के पौत्र एवं मयूर मेघा जैन के पुत्र कविश जैन के मस्तक पर महाराज श्री ने संस्कार किए। प्रतिदिन अभिषेक करने का संकल्प दिलाने साथ मद्य, मांस, मधु आदि 3 मकार के साथ 5 उदंबर फलों का त्याग कराया। नन्हा बालक कविश प्रतिदिन धोती दुपट्टे धारण कर अभिषेक पूजन में सम्मिलित रहता था।

जैन दर्शन के शास्त्रों में वर्णित विधि अनुसार बालक को 8 वर्ष की उम्र में ही जिनेंद्र भगवान के अभिषेक पूजन के योग्य माना जाता है। इसलिए अब तक वो अभिषेक कर नहीं पाता था। अब इस अवस्था में प्रवेश करते ही कविश ने भगवान का अभिषेक पूजन किया और समाज के सामने आदर्श उपस्थित किया। कविश जैन ने शास्त्र विधि को आत्मसात करते हुए यह सातिशय पुण्यवर्धक कार्य किया है और भावना भायी है कि प्रभु की सेवा में मेरा यह जीवन लगा रहे और जब तक घट में प्राण हो तब तक मुख पर प्रभु नाम हो। इस अवसर पर घोड़े पर बिठाकर कविश की शोभायात्रा निकाली एवं पुण्य की अनुमोदना की।

जगह-जगह शोभायात्रा का समाजजनों ने किया स्वागत 

जगह-जगह कविश का स्वागत किया एवं शोभायात्रा भक्ति से ओतप्रोत रही। सभी भक्ति में मगन होकर झूम रहे थे। इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा संसार में घुमाने वाला संस्कार है। सुसंस्कार की महिमा ही होती है। संस्कारी एवं उच्च कुल में जन्मा व्यक्ति कुसंगति में पड़कर चोर, डाकू बन जाता है। संस्कार ही जीवन को अच्छा बनाते हैं। सभी उत्कृष्टता को चाहते हैं। यदि उत्कृष्टता चाहते हो तो बिगाड़ दो लेकिन, बिगड़ने मत दो। जो भी बनता है बिगड़ कर बनता है। परिवार हो व्यापार हो मकान हो सिद्धांत है कि बगैर बिगड़े बनता नहीं। परम सुख को चाहते हो तो बिगड़ जाओ पर बिगड़ने मत देना बिना बिगड़े कोई बनता नहीं। उन्होंने गेहूं का उदाहरण देते हुए बताया कि मां ने गेहूं के दाने को बिगाड़ दिया और उसे आटा बना दिया लेकिन, बिगड़ने नहीं दिया। संस्कार के विषय में कहा कि संस्कार आपके बिगाड़ने के हैं बिगड़ने के नहीं। वर्तमान परिपेक्ष पर गुरुदेव ने कहा कि कुसंस्कारों के साथ व्यक्ति जीवन बिगाड़ रहा है। कुसंस्कारों को छोड़ो इन्होंने हमारी दुर्गति की है। श्रद्धान आ जाएगा तो संस्कार आ जाएंगे और उसी दिन मोक्ष हो जाएगा।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page