दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 127वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“कबीर मन पंछी भया, भये तो बाहर जाय।
जो जैसे संगति करें, तो कैसा फल पाए॥”
कबीरदास जी यहां मन की तुलना एक पंछी (पक्षी) से करते हैं — यह एक गहन प्रतीकात्मक तुलना है। जैसे पक्षी का स्वभाव होता है उड़ते रहना, एक स्थान पर न टिकना और दिशाहीन भटकना, ठीक उसी प्रकार मानव का मन भी चंचल और अस्थिर होता है।
यह मन कभी इंद्रियों के पीछे भागता है, कभी वासनाओं में उलझता है, कभी भूतकाल में उलझा रहता है, तो कभी भविष्य की चिंता में डूब जाता है। यह आत्मा की गति को नियंत्रित करता है और जीवन की दिशा तय करता है।
“भये तो बाहर जाय” — जब मन पंछी बन जाए, तो वह भीतर की ओर न जाकर बाहर की ओर भागता है। यहाँ “बाहर जाना” प्रतीक है — बाहरी आकर्षणों, भौतिक सुखों, इच्छाओं और माया की ओर प्रवृत्त होने का।
जब मन “भीतर” — अर्थात आत्मा की ओर — केंद्रित होता है, तब वह शांत, स्थिर और दिव्य होता है। लेकिन जब वह “बाहर” जाता है, तो मोह, माया और भ्रम में फंस जाता है।
“जो जैसे संगति करें, तो कैसा फल पाए” — यह पंक्ति अत्यंत गहन अर्थ रखती है। यह हमें कर्म, संगति और उसके फल के सूक्ष्म सिद्धांत को समझाती है।
यहां “संगति” का अर्थ केवल बाह्य रूप से किसी के साथ बैठना नहीं है, बल्कि उस विचार, उस भावना, उस प्रवृत्ति के साथ मन का जुड़ाव है।
यदि मन संतों, गुरुओं, आत्मज्ञान, भक्ति और सत्संग की संगति में रहता है, तो वह आत्मा की ओर उन्नत होता है।
यदि मन वासना, लोभ, क्रोध, अहंकार और विषय-भोग की संगति में रहता है, तो वह आत्म-विनाश की ओर बढ़ता है।
कबीर हमें यह सिखा रहे हैं कि मन पर नियंत्रण रखना ही साधना का मूल है।
जो साधक अपने मन को “बाहर” की चंचलता से खींचकर “भीतर” की ओर मोड़ लेता है, वही आत्म-साक्षात्कार और परमात्मा से मिलन की राह पर अग्रसर हो पाता है।













Add Comment