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भगवान और गुरु के सामने हम तो धूल बराबर : मुनि श्री सुधासागर जी ने प्रवचन से दिया दिव्य संदेश 


मुनि श्री सुधासागर जी इन दिनों विहार के दौरान विश्राम के दौरान धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। उनके दिव्य प्रवचनों से श्रावक-श्राविकाएं धर्म लाभ और पुण्य अर्जित कर रहे हैं। शनिवार को भी उन्होंने धर्म सभा संबोधित की। जबलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई और शुभम पृथ्वीपुर की यह खबर…


जबलपुर। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने शनिवार को धर्मसभा में कहा कि आप लोक व्यवहार में देखिए जितना व्यक्ति बड़ा बड़ा सेठ होता जाएगा, उसकी जिंदगी पराधीन होती जाएगी। कलेक्टर अपनी गाड़ी नहीं चला सकता। उसकी जिंदगी एक ड्राइवर के हाथ में होती है, चूक जाए तो जिंदगी बर्बाद हो सकती है। एक सेठानी की जिंदगी एक 10 हजार रुपये के रसोइए के हाथ में है, वह चाहे तो जहर खिला दे, यदि काश वो गरीब होती तो अपने लिए अपने पेट की रोटी अपने हाथ से बनाकर खा लेती, वो जिंदा रह जाती। बड़े आदमी के बेटे को मां के हाथ की रोटी नहीं मिलती, नौकर के हाथ की मिलती है और एक जिसकी मां गरीब है, उस बेटे को जिंदगी भर मां के दुलार की रोटी मिलती है, प्यार मिलता है, वो स्वाधीन है क्योंकि, गरीब है उसकी मां। आप राष्ट्रपति को देखिए स्वयं की सुरक्षा के लिए एक रायफल भी नहीं रख सकता। कहां अनमोल तुम्हारा गुरु और तुम दो कौड़ी के, उनके चरणों की धूल हो। भगवान और गुरु के सामने हम तो धूल बराबर हैं, यही अहोभाग्य है। जगत पूज्य आचार्य, उपाध्याय, साधु परमेष्ठी की जिंदगी तुम्हारे हाथ में है, उनकी चर्या, उनका रत्नत्रय का पालन तुम्हारे हाथ में है, आहार नहीं होगा तो वो जिंदा नहीं रह पाएंगे।

अहंकार मत करो मुझे किसी की जरूरत नहीं

संसार में क्या पता कब कौन सा जीव काम में आ जाए, मत समझो कि वह चूहा है, कभी जंगल के राजा को भी चूहा की जरूरत पड़ सकती है। अहंकार मत करो कि मुझे किसी की जरूरत नहीं है। एक हवा की जरूरत पड़ जाए, मत कहो कि ये पानी है, एक बूँद को तरस जाओ। मत कहो कि ये चींटी है, चींटी में भी बहुत बड़ी ताकत है, हाथी के भी प्राण ले लेती है, इसलिए धर्म ने आकर कहा कि तू मैत्रीपन, वात्सल्य मना, अनुकंपा व दया कर। सांप बिच्छू पर भी दया कर, वो भी कभी काम आएंगे। पारसनाथ ने नाग नागिन को बचाया था, उसी ने आकर पारसनाथ का उपसर्ग दूर किया था, इसलिए सबसे बना कर चलो क्योंकि तुम्हारी जिंदगी पराधीन है।

आपको धर्म करने की जरूरत है

जहां-जहां तुम्हे ये अनुभव में आ जाए कि ये गलत है लेकिन मुझे करना पड़ेगा, बस आपको धर्म करने की जरूरत है, आपको भगवान की, गुरु की, णमोकार मंत्र की, मंदिर की जरूरत है क्योंकि, आप सत्य को जानते हुए भी स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उसके लिए कोई धर्म की जरूरत नहीं है जो यह जानता है कि यह गलत है, मैं इसी समय छोड़ता हूँ। हिंसा करना सही है या गलत? यदि गलत है तो क्या छोड़ सकते हो, नहीं तो बस आपको जरूरत है मन्दिर की। यदि आप बिना हिंसा की अपनी जिंदगी जी लेंगे तो आपको कोई धर्म करने की, गुरु, मंदिर, किसी चीज की जरूरत नहीं।

हमें जरूरत है सुरक्षा कवच की

आप पाप मान रहे हैं, फिर भी नहीं छोड़ रहे हैं, अब आपको धर्म करने की जरूरत है, नहीं तो तुम बर्बाद हो जाओगे। अन्यथा ये पांचों पाप मिलकर वो दशा करेंगे जो चक्रव्यूह में अभिमन्यु की दशा हुई। इस संसार के चक्र में यदि तुम्हारे साथ देव-शास्त्र-गुरु नहीं है, तुम्हारे पास णमोकार मंत्र नहीं है, तुमने अभिषेक का गंधोदक नहीं लिया, तुमने पूजा पाठ नहीं की, भक्तामर नहीं पढ़ा तो ये आठों कर्म मिलकर ऐसी दशा करेंगे, जैसे अभिमन्यु की मौत हुई थी। तीर्थंकरो को कोई नहीं मार सकता इसलिए उन्हें कोई जरूरत नहीं है णमोकार मंत्र की लेकिन हमें और आपको कोई भी मार सकता है, इसलिए हमें जरूरत है सुरक्षा कवच की।

इज्जत के साथ जी रहे हो मरण भी इज्जत से हो

हर जैनी का जन्म इज्जत के साथ हुआ है, जिनके माँ बाप की इज्ज़त है, शान सौगात है, सारे महाजन है, कम से कम तुम्हारी जिंदगी तुम्हारे हाथ में आए तो इज्जत के साथ जीना, ऐसा कोई कार्य नहीं करना, जिससे तुम्हारी जिंदगी की बेज्जती हो जाये। ऐसे धंधे मत करो, ऐसे कार्य मत करो, जहाँ कुल की परंपरा व जाति के विपरीत जाना पड़े। इज्जत के साथ जी रहे हो तो मरण भी इज्जत के साथ हो। तुम भी पाप करना लेकिन ऐसा पाप मत करना कि गंधोदक लाइलाज हो जाये। णमोकार मंत्र, भक्तामर, शांतिधारा, गुरु का आशीर्वाद लाइलाज हो जाये। कोई तो कहने वाला रहें- मत मारो, इसने धर्म भी किया है।

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