दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में इन दिनों मुनिश्री के प्रवचन जारी है। मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि मंदिरों में शुभ भावों की चर्चा और मंत्रों का वाचन होना चाहिए। मंदिर देव शास्त्र गुरु की आराधना करने और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का स्थान है। इंदौर से पढ़िए, यह खबर…
इंदौर। शुभ विचारों के अभाव में जीव आनंद से वंचित हो दुःखी हो रहा है। चित्त चलायमान है और कर्म बंध प्रतिक्षण हो रहा है। आपके विचारों के अनुसार कर्म बंध होते हैं। बुरे विचार सभी को आते हैं। देव शास्त्र गुरु और अपने माता-पिता के प्रति भी बुरे विचार कर लेते हैं। जीवन में अच्छा चाहते हो तो पहले क्रोध, कषाय, मान, माया लोभ से मुक्त होने का पुरुषार्थ करो और अपनी पांचांे इंद्रियों को नियंत्रित कर संयमी बनो। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि यह उद्गार दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में शुक्रवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। धर्मसभा को उपाध्याय श्री विश्रुत सागर जी महाराज ने भी संबोधित किया और कि जिनके पुण्य का उदय होता है, उन्हें ही देव शास्त्र गुरु के पाद मूल में बैठने और जिनवाणी श्रवण करने का अवसर मिलता है। आपने कहा कि मंदिरों में शुभ भावों की चर्चा और मंत्रों का वाचन होना चाहिए लेकिन, आजकल लोग मंदिरों में कषायों का वचन और गोष्ठी करते हैं एवं स्वयं की आलोचना करने के बजाय देव शास्त्र गुरु की आलोचना करते हैं, जो शुभ संकेत नहीं है।
आपने कहा कि मंदिर देव शास्त्र गुरु की आराधना करने और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का स्थान है। इसलिए मंदिरों की पवित्रता और उसकी गरिमा का ध्यान रखते हुए सच्ची श्रद्धा प्रकट करना चाहिए। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज के गृहस्थ जीवन के माता-पिता डॉ. अभय जैन एवं अनिता जैन ने आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर धर्मसभा का शुभारंभ किया। संचालन डॉ. जैनेंद्र जैन ने किया।













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