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दोहों का रहस्य -49 परमात्मा को बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की गहराइयों में खोजें : ईश्वर-भक्ति और आत्मज्ञान ही सच्चे अर्थों में मुक्ति का मार्ग है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 49वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“जब ही नाम हृदय धारा, भया पाप का नाश मानो।

चिंगरी आग की, परी पुरानी घास॥”

“जब ही नाम हृदय धारा, भया पाप का नाश मानो”


इस पंक्ति में “नाम” केवल शब्द या मंत्र नहीं है, बल्कि यह “परमात्मा की दिव्य चेतना” का प्रतीक है। जब व्यक्ति अपने हृदय में सच्ची श्रद्धा, प्रेम, और समर्पण के साथ परमात्मा को धारण करता है, तो उसकी आत्मा में एक आध्यात्मिक क्रांति आ जाती है।

यह “नाम” केवल जप या उच्चारण तक सीमित नहीं है; यह एक आंतरिक जागरूकता और आत्मज्ञान का प्रतीक है। जब यह नाम सच्चे अर्थों में व्यक्ति के हृदय में बसता है, तो उसके भीतर संचित सभी बुराइयाँ, वासनाएं, और अज्ञान का अंधकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।

यहाँ “पाप” का अर्थ केवल धार्मिक या नैतिक दोषों से नहीं है, बल्कि यह उन सभी मानसिक विकृतियों और अज्ञान से भी है जो आत्मा को परमात्मा से दूर रखती हैं। अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, और माया की ग्रंथियां तभी खुलती हैं जब व्यक्ति परमात्मा के सच्चे स्वरूप को पहचानता है और उसमें समर्पित हो जाता है।

“चिंगरी आग की, परी पुरानी घास”

इस पंक्ति में एक अद्भुत रूपक (metaphor) प्रयोग किया गया है।

“चिंगरी आग की” (आग की चिंगारी) आत्मज्ञान, भक्ति, और ईश्वर-प्रेम की छोटी सी झलक का प्रतीक है। यह दिव्य ज्ञान का प्रकाश है जो मनुष्य को अज्ञान और बंधनों से मुक्त करता है।

“पुरानी घास” वे बुराइयां, वासनाएं और मोह-माया के बंधन हैं, जो लंबे समय से व्यक्ति के मन में जमी हुई हैं।

कबीर जी यह बता रहे हैं कि जब आत्मा में भक्ति और ज्ञान की छोटी-सी भी चिंगारी पड़ती है, तो वह वर्षों से संचित बुराइयों, अहंकार और सांसारिक वासनाओं को जला देती है, जैसे सूखी घास को आग की चिंगारी तुरंत भस्म कर देती है। कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से हमें यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि ईश्वर-भक्ति और आत्मज्ञान ही सच्चे अर्थों में मुक्ति का मार्ग है। जब मनुष्य सच्चे मन से प्रभु का नाम हृदय में बसाता है, तो उसकी समस्त बुराइयाँ उसी प्रकार जलकर समाप्त हो जाती हैं, जैसे आग की एक चिंगारी सूखी घास को तुरंत भस्म कर देती है।

इसका गूढ़ संदेश यही है कि परमात्मा को बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की गहराइयों में खोजा जाए। जब व्यक्ति अपने भीतर उस दिव्य चिंगारी को प्रज्वलित कर लेता है, तब वह संसार के सारे बंधनों से मुक्त होकर शाश्वत आनंद (परमानंद) को प्राप्त कर लेता है।

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