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पापी पर क्रोध न करें उसका स्वभाव है पाप करना : आचार्यश्री दे रहे जीवन, कर्म, धर्म, संयम के उपदेश 


मुनि श्री सुधासागर जी महाराज कटनी में धर्म सभा को संबोधित कर रहे हैं। उनके प्रवचन को बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हो रहे हैं। प्रवचनों से धर्मलाभ ले रहे हैं। आइए पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर…


कटनी। मुनिश्री सुधासागर इन दिनों कटनी में विराजित हैं। यहां जिनालय में वे नित धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। आचार्य श्री रोज जीवन, कर्म, धर्म, संयम के बारे में उपदेश दे रहे हैं। गुरुवार को उन्होंने यहां धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि

जब हमें समता का भाव को धारण करना हो तब हमें दुनिया के साधारण लक्षण को पकड़ना चाहिए। साधारण लक्षण पकड़ने से हमारे अंदर समता भाव आता है। हमारे परिणाम में तेरे-मेरे पन का भाव खत्म हो जाता है क्योंकि’ साधारण लक्षण में सभी वस्तुएं एक समान हो जाती है। अभेद दृष्टि जिसे कहते है, आध्यात्म भाषा में महासत्ता या तिर्यक सामान्य कहते है। तिर्यक सामान्य का अर्थ है कि संसार में जो कुछ भी है। वह एक समान एक रूप में है और हम सभी वस्तुओं का स्वभाव देखते है तो प्रत्येक वस्तु हमें विभावरूप देखने में न आए। जब व्यक्ति की दृष्टि में स्वभाव नजर आने लग जाता है तब वह सहज भाव को प्रकट करता है। विभाव इस दुनिया में कुछ है ही नहीं ऐसी दृष्टि हमारी बन जाए। हमें विभाव नजर आता है तो क्रोध आता है। द्वेष आता है, घृणा जागती है।

जहर का स्वभाव है मारना

बिच्छू का स्वभाव नजर आ जाए तो हमें बिच्छू पर क्रोध आना बंद हो जाएगा क्योंकि, उसका तो ऐसा स्वभाव है। बहुत सारे लोग किसी का नेचर समझने के बाद फिर राग-द्वेष करना छोड़ देते है कि भाई इसका ऐसा स्वभाव है। पापी पर क्रोध न आए क्योंकि, पापी का स्वभाव है पाप करना। जहर का स्वभाव है मारना।

पहले स्वयं को सुधारना है

इतनी विहंगम दृष्टि आ जाए कि हमारा दुश्मन है वह हमारा बुरा विचार रहा है कोई गलत नहीं कर रहा है क्योंकि, दुश्मन का स्वभाव है। यदि वह मेरा अच्छा विचारें तो मेरा दुश्मन कैसे? सामने वाला मित्र है और फिर वह बुरा विचार रहा है तो मित्र को कभी मित्र का बुरा नहीं सोचना चाहिए। अब ये है खिलाफ, अब तुम बुरा विचारोंगे तो दुर्गति में जाओगे। पहले स्वयं को सुधारना है कि हमें जगत के हर प्राणी को मित्र मानना है, फिर सामने वाले से गुरु कह देंगे कि मित्र के प्रति बुरा नहीं सोचते।

ये है विकासवाद का सूत्र

जब अपना विकास करना हो, जहां तुम हो उसमें यदि संतुष्ट नहीं हो तो उर्ध्वता सामान्य करना चाहिए, उर्ध्वता सामान्य कहलाता है आसाधारण लक्षण जिसका अर्थ होता है कि मैं सबसे कुछ अलग दिखना चाहता हूं, मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूं जो दुनिया में आज तक नहीं किया वो मैं करना चाहता हूं। ये है विकासवाद का सूत्र।

जैन दर्शन बस यहां से शुरू होता है

सुबह उठकर के यह भाव आ जाए कि आज मैं वो करूंगा, जो मैंने अभी तक नहीं किया, बस इस पर विचार करना है, जैन दर्शन बस यहां से शुरू होता है गुरु का उपदेश। मैं वह करना चाहता हूं जो मैंने आज तक नहीं किया इसलिए मैंने गुरु बनाया है। मैं वह समझना चाहता हूं जो आज तक समझ में नहीं आया, मैं वह देखना चाहता हूं जो आज तक देखने में नहीं आया।

उसका नाम है क्षयोपशम लब्धि

क्षयोपशम लब्धि में कुछ नहीं करना है अपने आप को पापी सिद्ध करना है, इस संसार के स्वरूप को समझना है। उसका नाम है क्षयोपशम लब्धि। माचिस की काड़ी जितनी देर जलती है, अच्छे निमित्त उतने ही समय के लिए मिलते हैं। माचिस की काड़ी के समान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज अपनी जिंदगी में आए थे। जिन्होंने दीप जला लिए वे आज भी जल रहे हैं, प्रकाश में है और जो उन्ही के भरोसे बैठे रहें, वे सब अंधेरे में है

इस स्थान को पवित्र घोषित करता हूं

गुरु ने कहा कि पहले यह बता कि तू संसार के संबंध में कितना जानता है? फिर तेरा उससे भाव निकालने का है या नहीं। क्यों मिला तुम्हें भारत देश-हमने जहां चाहे, जो चाहे, जैसे चाहे, जब चाहे, नहीं किया होगा, हर स्थान को गंदा नही किया होगा। इसलिए वास्तु कहता है कि अपने घर में एक स्थान पवित्र स्थान बनाओ, यहां भोजन नहीं करूंगा, जूते चप्पल पहनकर प्रवेश नहीं करूंगा, मैं इस स्थान को पवित्र घोषित करता हूं, उस समय तुम्हें आर्यखंड में जन्म लेने का पुण्य का बंध हो गया।

कोई न कोई तीर्थ क्षेत्र जरूर बनाना है

यदि तुम चाहते हो कि मेरा शाश्वत आर्यखंड जन्म हो तो आप अपनी कमाई में से, पूरे गांव, जिले के लोग मिलकर के एक तीर्थक्षेत्र की घोषणा करना, इस तीर्थक्षेत्र को मैं पवित्र घोषित करता हूं। इस क्षेत्र में मैं पाप नहीं करूंगा और न ही दूसरों को करने दूंगा। जिस समय तुमने यह संकल्प किया, उसी समय कर्म ने तुम्हें विदेह क्षेत्र में जन्म लेने का एडमिशन कर दिया। क्या है तीर्थ क्षेत्र बनाने की जरूरत, जब नगर में मंदिर है क्योंकि शाश्वत विदेह क्षेत्र में जन्म लेना है तो हमें अपने हाथों से कोई न कोई तीर्थ क्षेत्र जरूर बनाना है।

ऐसे जीव चौथे काल में जाकर जन्म लेंगे

कोई काल पवित्र नहीं है, अब धर्मात्मा को छूट दी गई है कि इस पापी काल में जहां सब लोग पाप करते हैं, तुम अपनी साधना के बल पर 8 दिन में एक दिन के काल को पवित्र कर दो, जिसका नाम है अष्टमी और चतुर्दशी। ऐसे जीव चौथे काल में जाकर जन्म लेंगे। 24 घंटे में एक काल को पवित्र कर दीजिए। जिससे संधिकाल या सामायिक काल कहते हैं, हफ्ते में, महीने में, वर्ष में किसी के काल को पवित्र कीजिये। नही कर सको तो जिंदगी में किसी के काल को पवित्र घोषित करके मरना।

महाव्रती न पाओ तो पात्रदान देना

स्वाध्याय करके मात्र सम्यकदर्शन प्राप्त कर संतुष्ट नहीं होना क्योंकि, वो तो बिना पढ़े भी हो जाता है, कुछ असामान्य करके दिखाओ, तुम मनुष्य हो तो महाव्रती बनकर दिखाओ। कम से कम जिंदगी भर भावना तो करना। महाव्रती न पाओ तो पात्रदान देना क्योंकि 84 लाख योनियों में मात्र महाजन दे सकता है। यदि आहारदान आदि न दे सको, मनुष्य पर्याय में उच्च कुल में तुमने जन्म लिया है तो एक जिनालय बनाकर जरूर मरना, जिन लेना बना सकूं तो जिनालय की ईंट लगाकर जरूर मरना।

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