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दोहों का रहस्य -4 स्वयं का उत्थान जरूरी है : हमें अपनी आत्मा के कल्याण में लग जाना चाहिए


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की चौथी कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

जब मैंने इस संसार में बुरे लोगों को खोजा, तो मुझे कोई भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला। परंतु जब अपनी अंतरात्मा को खोजा, तो मुझे एहसास हुआ कि मुझसे बुरा इस संसार में कोई और नहीं है। अर्थात, व्यक्ति जीवनभर दूसरों के अवगुणों पर दोषारोपण करता रहता है, लेकिन स्वयं को देखने का समय उसे कभी नहीं मिलता।

अब समय आ गया है स्वयं का उत्थान करने का। हमें अपनी आत्मा के कल्याण में लग जाना चाहिए। अपने अवगुणों को समाप्त कर, धार्मिक प्रवृत्ति से क्रियाकलाप करते हुए, मन, वचन और काय को शुद्ध करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार, हम इस जीवन को और आगामी भव को सुधारने का प्रयास कर सकते हैं, और यही हमारी समझदारी है।

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