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मुनिश्री के समाधि स्थल मुंगावली में बनाया गया है निःशंकधामः मानस्तंभ का हर साल होता है महा मस्तकाभिषेक


श्री निःशंक सागर जी महाराज जी के 10वें समाधि दिवस पर विशेष जानकारी यहां दी जा रही है। श्री निःशंक सागर जी का इंदौर से भी गहरा नाता रहा है। उनके समाधि दिवस पर उन्हें गुरु भक्त श्रद्धा से स्मरण कर रहे हैं। पढ़िए इंदौर से हरिहर सिंह चौहान की यह खबर…


इंदौर। ‘हमारे साथ बारात है आंसुओं की। मैंने दर्द की दुल्हन संग सगाई रचाई है।’ ‘तुम मेरे साथ चलकर मुस्कुरा सको तो विश्वास दिलाता हूं, जिंदगी का उपसंहार उजालांे के आंगन में होगा।’ ‘जहां आंनद की शहनाई और अपनत्व के मंगलाचार का महा महोत्सव होगा’। यह सृजनात्मक विचार संत शिरोमणि आचार्यश्री 108 विधासागर जी महाराज के शिष्य समाधिस्थ एलक श्री निःशंक सागरजी महाराज के हैं। जो मुस्कान के राजहंस थे।

जो अपनी मुस्कान की स्मृतियों को छोड़कर अपने अंतस की चेतना में खो गए। हम सबसे दूर जरूर हो गए। ऐसे एलक श्री निशंकसागर जी का 16 दिसंबर को 10वां समाधि दिवस है। इस अवसर पर हम सभी उन्हें उनकी स्मृतियों को सहेजने के लिए उनके बताए मार्ग पर अपने आप को लगाएं। जन जागृति के साथ समाज और धर्म के मार्ग पर चलकर आगे बढ़ते रहें।

सेठ हुकुमचंद जी का योगदान भी कम नहीं

इंदौर शहर को अपनी पहचान दिलाने वाले जैन समाज की कीर्ति को जगविख्यात करने वाले सर सेठ हुकुमचंद जी ने संस्कृति और सभ्यता को बचाने के लिए धर्म धारा को प्रवाहमान बनाए रखने के लिए बहुत योगदान दिया। लोग अपने लिए बहुत कुछ करते हैं लेकिन, सेठ हुकुमचंद जी ने पीढियों की दिशा बदल दी। होस्टल, धर्मशाला और विभिन्न मंदिरों का निर्माण किया।

श्री निःशंक सागर जी महाराज ने यहां मंदिर में जीर्णाेद्धार कराया

प्राचीनतम धरोहरों में इंदौर शहर के सबसे पुराने दिगंबर जैन मंदिर में पुराने शहर के मध्य जबरी बाग नसिया धर्मशाला स्थित चिंतामणि पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर बहुत अतिशयकारी और जाग्रत है। इस भव्य मंदिर को और भी प्रसिद्ध करने में इस युग के भगवान परम पूज्य आचार्यश्री विधासागर जी शिष्य समाधिस्थ एलक श्री निःशंक सागर जी महाराज ने यहां मंदिर में जीर्णाेद्धार कराया और पंचकल्याणक और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कराकर नसियाजी के भगवान पारसनाथ बाबा के अतिशय को भक्तों को बताया। इसी पुण्य योग से प्राचीन मानस्तंभ जो प्रांगण में है। उस मानस्तंभ का हर साल महामस्तकाभिषेक कराए जाने की परंपरा चालू की, जो आज तक निरंतर चल रही है। वहीं इस प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री विधासागर जी का दो बार दर्शन का पुण्य प्राप्त हुआ। नसियाजी के बडे़ बाबा और छोटे बाबा का वह अतिशय बहुत पुण्य सौभाग्य से प्राप्त हुआ।

नसिया जी की देशभर में है पहचान

यहां एलक श्री निःशंक सागर जी महाराज का आशीर्वाद ही था, जो आज नसिया जी मंदिर पूरे भारत में अपने अतिशय के लिए जाना जाता है। 16 दिसंबर को बंगला चौराहा मुंगावली अशोक नगर में एलकश्री निःशंक सागर जी की समाधि हुई थी। जहां निःशंक धाम बनाया गया है।

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