दिगंबर जैन समाज के दसलक्षण पर्व के चतुर्थ दिवस पर दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्री पार्श्व पद्मावती धाम दिव्य तपस्वी राष्ट्र संत वात्सल्य सम्राट पलवल तीर्थ उपसर्ग निवारक आचार्य श्री सुंदरसागर जी के आशीर्वाद से पर भूगर्भ से अवतरित श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान का पंचामृत अभिषेक और शांतिधारा की गई तथा उत्तम शौच धर्म की पूजा की गई। पढ़िए यह रिपोर्ट…
पलवल। दिगंबर जैन समाज के दसलक्षण पर्व के चतुर्थ दिवस पर दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र श्री पार्श्व पद्मावती धाम दिव्य तपस्वी राष्ट्र संत वात्सल्य सम्राट पलवल तीर्थ उपसर्ग निवारक आचार्य श्री सुंदरसागर जी के आशीर्वाद से पर भूगर्भ से अवतरित श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान का पंचामृत अभिषेक और शांतिधारा की गई तथा उत्तम शौच धर्म की पूजा की गई। इस पर्व के विषय में श्री पार्श्व पद्मावती धाम के व्यस्थापक नितिन जैन ने बताया…
उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुण रतन भंडारी।’
अर्थात
जिस व्यक्ति ने अपने मन को निर्लोभी बना लिया है, संतोष धारण कर लिया है, उसका जीवन परम शांति को उपलब्ध हो जाता है
जो व्यक्ति उत्तम शौच धर्म को धारण करता है उसकी आत्मा लोभ ओर लालच जैसे मल का त्याग कर परम् उज्ज्वलता को प्राप्त होती है
उस व्यक्ति के मन में संतोष गुण तथा अनेक गुण रत्नों के भंडार प्राप्त होते है, उसका जीवन परम शांति को उपलव्ध होता है
आज अपने मन में संतोष गुण को धारण कर लोभ लालच का त्याग,लोभ कर के पर भी पुण्यहीन मनुष्य को धन की प्राप्तिनाही होती और लोभ नही करने पर भी पुण्यशाली को जगत की सारी संपदा प्राप्त हो जाती है अतः धन का लोभ धनलाभ में निमित्त नही है धनलाभ में पुण्य निमित्त है।
कौरवो ने संपूर्ण राज्य चाहा पर हैं होने से प्राप्त नही हुआ और पांडवों का पुण्य परवल होने से नही चाहते हुए भी सब कुछ प्राप्त होता रहा। राम जंगल मे भी रहे वहां भी पुन्ययोग से पुण्य के साधन मिलते रहे पर रावण को सोने की लंका में भी प्रतिकूलता बानी रही आचार्य भगवन ने कहा है कि संतोष रूपी निर्मल जल जो तीव्र लोभ रूप मलपुंज को धोता है तथा भोजन की गृद्धता से रहित है उसको विमालता रूप शौच धर्म होता है दशलक्षण पूजा में लिखा है
धरि ह्रदये संतोष करहु तपस्या देह सो।
सोच सदा निर्दोष धर्म बड़ो संसार मे
सम्यकदृष्टि जीव हमेशा धन नही धर्म की ओर दृष्टि रखता है संसार मे धनवान बड़ा नही धर्मवान बड़ा है और इसलिए धबान कि नही धर्मात्मा की पूजा होती है
पूज्यपाद स्वामी ने सर्वार्ध्सिद्दी में लिखा है
शुचेभावः शौचं
शुचिता का भाव ही शौच धर्म है अर्थात मन, वचन ,काय में शुद्धता आना ही शौच धर्म है।
समयसार में कुन्दकुन्दस्वामी ने कहा
ज्ञानी जीव मैन को अपवित्र बनाने बाले काषायिक भावो को जानते ही उसे दुःख का मूल कारण मानकर उससे निर्वृत्ति ले लेता है वह तत्क्षण अपनी आत्मा को परिमार्जन कर शौच धर्म का स्वामी बन जाता है।













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