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उत्तम आर्जव धर्म पर विशेष आलेख: मायाचारी का त्याग करने से आर्जव धर्म प्रकट होता है


आर्जव धर्म का उत्तम लक्षण है वह मन का स्थिर करने वाला है पाप कर्म नष्ट करने वाला है और सुख का उत्पादक है इसलिए इस भव मैं आर्जव धर्म को आचरण में लाओ उसी का पालन करो क्योंकि वह भव का क्षय करने वाला है। मन वचन काय की सरल प्रवृत्ति का नाम आर्जव हैं मायाचारी का त्याग करने से आर्जव धर्म प्रकट होता है। पढ़िए बाल ब्रह्मचारी झिलमिल दीदी का विशेष आलेख               


आर्जव धर्म का उत्तम लक्षण है वह मन का स्थिर करने वाला है पाप कर्म नष्ट करने वाला है और सुख का उत्पादक है इसलिए इस भव मैं आर्जव धर्म को आचरण में लाओ उसी का पालन करो क्योंकि वह भव का क्षय करने वाला है जैसा अपने मन में विचार किया गया है वैसा ही वैसा ही दूसरों से कहा जाए और वैसा ही कार्य किया जाए इसी प्रकार मन वचन काय की सरल प्रवृत्ति का नाम आर्जव हैं मायाचारी का त्याग करने से आर्जव धर्म प्रकट होता है भला इस मायाचारी से हमको क्या मिलता है सिर्फ दुख नीच गति और अपमान इसलिए आज मायाचारी छोड़ने का दिन है सरलता उत्पन्न करने का है इस मायाचारी जीवन को बिताने से तेज गति का आश्रय होता है हर इस मायाचारी जीवन को जीके क्या लाभ मिल जायेगा अरे विचार करो थोड़ा सा जीवन में मायाचारी न जाने हमें कितने भवों में घूमा रही है और बार-बार हमें चारों गति के दुख का वेदन करना पड़ रहा है।

इसलिए भव्य आत्माओं मायाचारी को छोड़ो पर क्या करें पंचम काल मायाचारी तो हो ही जाती हैं। व्यक्ति कहता है कि आजकल तो साधु भी मायाचारी करते हैं, तो इंसान क्यों नहीं तब आचार्य भगवंत बोलते हैं कि कर्म किसी के साथ पक्षपात नहीं करते हैं भले कितनी ही भीड़ में बैठ जाओ कर्म तो तुम्हें ढूंढ ही लेंगे और उसकी सजा भी देंगे मैं तुमको एक मुनिराज की कहानी सुनाता हूं जो मायाचारी के कारण त्रिलोक मंडल हाथी बने इसलिए है भव्य आत्माओं यह मत सोचो कि कर्म मुनिराज को छोड़ देते हैं नहीं हां अगर उसका प्रायश्चित कर ले तो कुछ बात बने। प्रायचित भी दिल से होना चाहिए चलो मैं तुमको एक कहानी सुनाता हूं मन लगाकर सुनो,

कर्म किसी को नहीं छोड़ता 

एक पुरानी कथा है कि एक मुनिराज एक गांव में 4 माह मतलब चातुर्मास का उपवास करके विहार कर गए। उसीसमय दूसरे मुनिराज वहां पर आ गए गांव वालों ने कहा कि देखो कितने धन्य मुनिराज जो 4 महीना से उपवास कर रहे हैं उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया कि वह मैं नहीं हूं क्योंकि उनको अपनी प्रशंसा में आनंद आ रहा था जब किसी जीव का नीच गति का बंध होता है तो विनाश काले विपरीत बुद्धि आ जाती है जो उन मुनिराज की हो गई अब मुनिराज की समाधि का समय आया समाधि हो गई समाधि के बाद जो उनकी गति हुई त्रियंच गति में त्रिलोक मंडल हाथी बने जो मान घमंड करता है वह हाथी की पर्याय को धारण करता है इसलिए जीवन में मान घमंड नहीं करना कितना भी कोई लालच दे फिर भी हमको मायाचारी से दूर रहना चाहिए

पक्ति के द्वारा समझे

कोई बुरा कहो या अच्छा लक्ष्मी आवे या जावे। लाखों वर्षों तक जियु या मृत्यु आज ही आ जावे। अथवा कोई कैसा भी भाई या लालच देने आवे। तो भी न्याय मार्ग से मेरा कभी ना पद डिगने पावे।

अर्थात=कोई मुझे लालच दे या बुरा भला बोले मैं अपने धर्म मार्ग से नहीं डिगने वाला ऐसा जो सच्चा श्रद्धा रखता है वह निश्चित भव्य जीव होता है। संसार सागर से पार हो ही जाता है कभी ना कभी तो हो ही जाएगा इसलिए अपने जीवन में सरलता लाए जो मन में है वह वचन से कहो जो वचन में है उसे तन से करो यह हमारा जीवन बहुत अनमोल है। इसे व्यर्थ न जाने दे। अपने आपका मूल्यांकन जरूर करें। जब तक आप अपने आप का मूल्यांकन नहीं करेंगे तब तक आपकी पहचान अपने आप से नहीं होती, इसीलिए है भव्य आत्मा अपने आप को पहचान। जब तक अपने आप को नहीं पहचानेगा तब तक तू भगवान आत्मा नहीं बन सकता आजकल की हालत देखो व्यक्ति कैसे संसार में फंसा है। बस पैसा आए कैसे आए यह विचार नहीं करता पैसा तो आ जाएगा पर यह स्वर्ण पर्याय चली गईं तो कैसे आएगी। सब जगह मायाचारी ही मायाचारी भरी हुई है। हम लोग बाजार में निकलते हैं सभी व्यापारी मायाचारी से भरे हुए हैं। हम लोग पेपर भी इतना मायाचारी से करते हैं कि आज ही सबसे ज्यादा पैसे वाला हो जाऊं एक सुनार की दुकान पर जब जाते हैं तो वह अपने वहा के लोग से भी मायाचारी कर बैठता है। एक दर्जी के पास जब हम कपड़े सिलवाने जाते हैं, तो बहुत ज्यादा कपड़ा मंगवा कर कम कपड़ा इस्तेमाल करता है। देखो हमारी विडंबना बना यह संसार की विडंबना है। मायाचारी जब रावण ने सीता का हरण किया तब साधु का भेष बनाकर उसने मायाचारी की पर क्या फायदा हुआ इतना बैर निकाल युद्ध मार कटाई सिर्फ पापों का बंध और उसके बाद रावण नरक गया। उसको ना सीता मिली और अपने लोगों का दुख बहुत मिला। सबसे अपमान मिला और सबकी सुनने को मिली, इसलिए ही भव्य आत्माओं इस मायाचारी को तज और निज आत्मा मैं लग जा जिससे यह भव और प्रभव सुधर जाए क्योंकि हम जैन कुल में पापों से मुक्त होने के लिए आए हैं ना की पुण्य से पाप करने जैन कुल हमको हमारे महा पुण्य कर्मों से मिला है। तो इस नर भव को सफल बनाएं अपनी आत्मा से मायाचारी को दूर करें जीवन को उत्थान की ओर ले जाए।

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