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कहानी उत्तम आर्जव धर्म की : जैसा बोलें, उसी के अनुरूप काम करें


उत्तम आर्जव धर्म का पालन करने से समाज में विश्वास और सामंजस्य बढ़ता है, और यह व्यक्ति के स्वयं के मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए भी आवश्यक है। यह सिद्धांत भारतीय संस्कृति में आदर्श आचरण का एक महत्वपूर्ण भाग है और जीवन को एक नैतिक और सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। आज पढ़िए उत्तम आर्जव धर्म की कहानी….


आंखों से देखा और कानों से सुना सत्य नहीं होता, मात्र ज्ञान से जाना हुआ ही सत्य होता है। वस्तुनि ष्ठ कथनों का आचरण करना चा हिए। चरित्र ही धर्म का मूल है तथा चरित्र का मूल सम्यक दर्शन है। वर्षा काल का वह समय, जब जीव जंतु वर्षा के कारण जमीन से बाहर विचरण करने लगते हैं। ऐसे समय में संतजन जीव दया मात्र को लेकर जीवों की हिंसा न हो, इसके लिए एक स्थान पर बैठकर वर्षा काल के समय चार माह तक एक ही स्थान पर रुककर साधना करते हैैं।

इसे ही चातुर्मास कहा गया है। एक बार गुणनिधि नामक मुनिराज एक पर्वत पर मौन होकर तपस्या कर रहे थे। तप के प्रभाव से उन्हें आकाश में चलने की दिव्य शक्ति मिली हुई थी। अतः चार्तुमास समाप्त होने के बाद वे आकाश मार्ग से चले गए। उसी समय मृदुमति मुनि आकर गांव में आहार के लिए गए। गांव के लोगों को लगा कि ये तो गुणनिधि महाराज है। अतः सभी ने उनका आदर सत्कार किया। उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया। मृृदुमति महाराजा यह समझ गए थे कि गांव वालों से समझने में भूल हुई है।

भोजन के स्वाद में आसक्त होकर मृदुमति ने किसी से कुछ नहीं कहा। उन्होंने लोगों के साथ धोखा किया। इसके लिए उन्हें तिर्यंच गति मिली। उन्होंने अगले जन्म में हाथी के रूप में जन्म लिया। कहानी से सीख हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम कभी भी मायाचारी या किसी के साथ धोखा न करें। हमेशा सरल बने रहें। हमें आर्जव धर्म यही सिखाता है। जैसा हमारे मन में है, हमें वैसा ही बोलना चाहिए और काम भी उसी के अनुरूप करना चाहिए।

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Shreephal Jain News

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